An Atta-boy

by | Mar 8, 2019

They do not have advantage of a complicated system of metaphysics which could explain or rationalize  events for them. Their gods and goodness are much too simple to be of much help.

प्रिय मित्र

याद है वो पुराना किस्सा? वो काशीपुर? खत के बदलो से सतह दर सतह उतरोगे तो काशीपुर के पास ही एक छोटा नगर नज़र आएगा| यहा सुबह नौ बजे मैं चकोली ख़ाता हुआ तुमसे मिलूँगा| चाँद के आकर का ये व्यंजन असल में डोसा ही है| परंतु छोटा-मोटा और  मूँगफली की चटनी के साथ एक दम लाजवाब| एक साथी होगा अनन्दक्रिश्नन और दूसरा पतली-छोटी काठी का, त्रिनाथ|

अनन्दक्रिश्नन के बारे में मिलकर विस्तार से बतलौंगा| उसकी बात करते हुए काफ़ी शामे विस्तार करेंगे| ऐसे लोगो से मिलना जिन्हे हिन्दी स्पष्ट नही आती| बोली में अँग्रेज़ी में विचारो को व्यक्त करना एक संघर्ष है| ऐसे लोगो से बात करना, लंबा समय बिताने पर जो प्यार और जो अनोखी कहानिया जनम लेती है; उनका कोई हिसाब नही| सुनने की काफ़ी क्षमता पैदा होती है| है ना? इस बात से तो आप भी ज़रूर संबंधित होंगे| यहा कयि सारे किससे पहली बार हुए| और क़िस्सो की खूबी पता है मित्र? वह आपको उन्न सच्चाइयो से मौजूद करवाते है जिन्हे अपने कभी सोचा ही नही या किसी मोड़ पर अनदेखा छोड़ दिया या वो इतने कड़वे थे की उसे थाली में ही छोड़ दिया गया| तो आज में तुम्हे त्रिनथ के बारे में और उससे जुड़ा एक किस्सा तुम्हे बतलौंगा|

लगभग बीस वर्ष का छोटी काठी, सुर्ख आँखें और तने हुए गाल| शर्म से सहमा डरा हुआ एक ओट में खुदको छुपाए ये अभी-अभी रायगडा में हमारे साथ रहने आया है| सुनोगे! कहता है “हिन्दी थोड़ा, तेलगु थोड़ा, इंग्लिस टीके और उडिया और एस-टी भाषा पूरा” (एस-टी भाषा याने अनुसूचित जाती की भाषा)| यहा कई सारी जनजाति भाषा है| छे: का नाम तो मैं ही तुम्हे गिना सकता हूँ पर फिर कभी| तो इन जनाब को पाँच भाशा मालूम है और पता है ना, ज़्यादा भाषा जानने से आपके दिमाग़ का विकास अधिक होता है| पर खैर त्रिनथ कहेगा, “दिमाग़ विकसित करके मुझे क्या करना है? नौकरी भर मिल जाए आज्ञा|”

दसवी पूरी करने के बाद, साल भर बाद घंटो आसमान ताका है इन्होने| आज भी सुबह उठ कर सबसे पहले आकाश देखने भागता है छत पर| निचली जाती के कस्बे में खूबसूरत पहाड़ो, पत्थरो, धान, अल्सि और मंडया के खेतो के बीच इसका घर और आकाश है| फ़रवरी में आस-पास के सारे पहाड़ इनके गाव में अल्सि के जरद रंग से भर जाती है| सर्दी की वो सूरज की किरण इन पर टप्पा खा कर वापस आती है| “खूबसूरत गाव” ये इनके शब्द है मेरे नही| मैने सिर्फ़ इनका गाव इनकी आँखों से ही देखा है| ये कहते है की दूर दराज से लोग यहा चलचित्र् की शूटिंग करने आते है| घर से कुछ अड़ाई किलोमेटेर चड़ाई की दूरि पर भव्य खंडहर है राजा का| माटी से बना हुआ, गेरू कत्थई रंग से ढका हुआ| जैसे पहाड़ का ही हिस्सा हो|

याद है! माँ ना पूछती थी स्कूल से घर आने के बाद की आज क्या सीखा? फिर जनाब कहानिया बनानी पड़ती थी कुछ याद ना आए तो| फिर बड़े हुए और प्रेमिका से लंबी बातों का सिलसिला शुरू हुआ| फोन उठाते ही हल्का फुसफुसाता सवाल, “क्या किया आज तुमने?”| अब बात करनी है तो रोज़ जिंदगी में कुछ रोचक या उबोउ काम करना पड़ेगा| खाली बैठने वाले दीनो की श्यामत आ गयी| इतने वर्षो में खाली बैठने वाले दीनो की गिनती एक हाथ पर की जा सकती है| अब आप लिहाज़ा कहेंगे की कहा जनाब ऐसा तो मेरे साथ अक्सर होता है| पर क्या आप अपने मोबाइल से दूर रहते है उन दीनो| या किताब या संगीत तो सुनते ही होंगे| चलिए मान लेते है ऐसा आपके साथ अक्सर होता है| पर मानिए की ये एक रोज़ दिनचर्या में बदल जाए और समय काटने के लिए आपके पास इनमे से कोई ताम झाम ना हो| यकीन फरमाइए| चंद दिन बड़ा सुकून मिलेगा फिर ख़ालीपन काटेगा फिर आएगी ग़रीबी, फिर आएँगे ताने फिर हीनता घृणा और हार| बेरोज़गारी कुछ दूर दराज के गावों में इसी छवि में आती है और उपर से निचली जाती का श्राप|

“त्रिनथ” जिसने इस खत को आधार दिया और बेरोज़गारी का कड़वा घूट पिया| बस चंद दीनो पहले ही रायगड़ा आया है| सीधी-साधी उमँगो की पोटली लेकर अपनी नयी नौकरी के लिए तैयार| रायगड़ा से खबर गयी की कोई वगेरह साहब को किसी काम करने वाले की ज़रूरत है| जो उनके भुवनेस्वर के घर में चौकीदारी कर सके और दिनचर्या का काम-धाम देख सके| इन वगेरह साहब ने पगार भी बड़ी मोटी रखी है केवल अठारह घंटे काम करने की| छे हज़ार टनका| छे हज़ार रुपय और रहना खाना मुफ़्त| घर से सिर्फ़ दस घंटे दूर| ये नौकरी और बड़े शहेर के कालेज जाने की प्रबल इच्छा इन्हे यहा ले आई| सच बताओं तो इसे शहर ही पसंद| रात को जब अंधेरा गाव को अपने भीतर समेट लेता है और जंगली आवाज़े गूँजती है| तब वो सहम जाता है| और  हर रात उससे छुटकारा पाने का स्वप्न देखता है|

“वो लाल सड़क कहा जाती है?”, सुबह छत पर उसने मुझसे पूछा| कुछ घंटे पहाड़ो को घूर्ने के बाद मुझे वो पहाड़ो को चीरती लाल रेखा दिखाई दी| आश्चर्या हुआ मैने इतने महीनो में कभी उसे नही देखा| वो दिन में शायद रास्ता खोजता है और मैं चाँद की आस में मदहोश| कितना अंतर है हमारी उम्मीदो में| मेरा दरिया एक उसके दारिये चार| मेरी नज़रे रोशनी के पर्दो में घिरी हुई और अंधेरा उसका जिगरी यार|

तो बड़े साहब ने इन्हे यहाँ प्रक्षिक्षण के लिए भेजा| क्यूँ? क्योकि ना इन्होने कभी गेस वाले चूल्‍हे पर खाना बनाया है ना फ्रिज इस्तेमाल किया है कभी| मनुश्य-मसिन का ताल मेल इनके लिए एकदम नया है| ये वाहा से आते है जहा हर सामान हाथ से बुना हुआ होता है और खेत  इतने छोटे की ट्रॅक्टर भी शर्मा जाए| इनके खाली समय को रंगो और शहरीकरण से भरने के लिए मैने दो-चार किताबे थमा दी| अब भाई थोड़ा ज़िम्मा हमारा भी बनता है| अपने से छोटे व्यक्ति में ज्ञान ठुसने का| बड़ा महसूस कौन नही करना चाहता और लिहाजा तारीफ का हकदार बनना| अपने पिंजरे में बैठा अख़बारो से तस्वीर देख उनका चित्र बनाता| कहता है, “भैया मैने आर्ट बनाया|” फिर घंटो यकीन मानिए घंटो किताब से अँग्रेज़ी के शब्द देख उनको काग़ज़ पर उतरता| ये उसे इतना पसंद है की वो एक ही दिन में आठ-आठ पन्ने भर देता| और लिखाई खरी और साफ, जैसे अँग्रेज़ी बेह रही हो उसके हाथो से|इसके पीछे उसकी धुन क्या थी ये तो वही जाने|

अरे आप खो तो नही गये? वापस आइए अभी किस्सा शुरू हुआ है| अब तक आप की आखो में त्रिनथ की कोई ना कोई छवि आ ही गयी होगी|

तो हुआ यूँ की एक रात मैं और अनन्दक्रिश्नन अपने हाथो में रोशनी के पर्दे लिए चकाचोँद हो रहे थे और उसकी गहराई में डुबकी लगा रहे थे| शहरी रोशनी ने तारो को घूमरा कर दिया और वो रास्ता भटक गये| हमने अपने आलस को आलाप दिया और त्रिनथ को तीस रुपय थमाकर आटा लेने भेजा| कुछ घंटो बाद वो छत पर वापस लौटा और मदहोशी में गुम हमने मान लिया की वो सामान ले आया| होश आने पर हमने आटे के बारे में पूछा, “नानी को दे आए ना?”| तो जवाब आया की ये पॅकेट से एक दम बढ़िया रोटी बनेगी| जिस छोटे पॅकेट को हमने आटे के साथ फ्री आई सामग्री समझा, वह उसी को आटा समज बैठा| मामला संगीन हो गया और हम नेता| छाती चौड़ी करके दुकानदार का कान पकड़ने निकले| दुकान जान पहचान की थी, पिछले कुछ महीनो से यही से रोज़ी रोटी चल रही थी और वही पकडंडी त्रिनथ को रॅटा दी गयी थी|इससे पहले की हम बरसते उन्होने हमे देखा फिर त्रिनथ को देखा| और बोले ये कदरदान “यीपी” का पकेट लेकर ही ऊडन छू हो गये और आटा पीछे छूट गया|

इस किस्से के छोर खुले छोड़ रहा हूँ मित्र| तुम अपने कलम से उन्हे तराशना|

अच्छा वैसे पता है मित्र किसी ने मुझे “साया” तोहफे में दिया| उसके बारे में जानना चाहोगे? अगली बार लिखूंगा| खत का इंतेज़ार रहेगा| चलता हूँ, नयी कहानिया तराशने|

सिर्फ़ तुम्हारा

शैलेश किंटसुगी

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