काशीपुर से ख़त

by | Jan 14, 2019

प्रिय मित्र,

कभी रोमांटिसिज्म के बारे में सुना है? कहीं उन्नीस्वीं सदी में इस टर्म को पहली बार इस्तेमाल किया गया होगा| पहले भी होता होगा पर उन्नीस्वी सदी के बाद इसने गति पकड़ ली| ये एक जादुई पर्दे की तरह है जो न होता तो हिन्दी सिनेमा कब का ठंडा गोश्त बन गया होता| असल में आजकल का प्रेम, स्वप्न और कहानियां, सब इसी पर निर्धारित होती हैं, जिनमें कड़वे सच या आम किरदारों को हटा कर सिर्फ़ ड्रामा और मीठे क्षणों को रेखांकित किया जाता है| शायद इसलिए साल दर साल हमारे लिए मंटो जैसे लेखक असहनीय हो गये हैं|

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काशीपुर में ग्रीष्म का खूबसूरत सूर्यास्त

मैं और मेरा कलम मामूली हैं पर कल्पना मेरा सच| मैं भी आज ओड़िशा और उसके छोटे से इलाक़े, काशीपुर के बारे में आज ऐसा ही चित्रांकन करूँगा जो मेरी कड़वी दृष्टि से दूर होगा| यह सब क्यूँ? क्या ज़रूरत थी ये सब बताने की? मैं मानता हूँ की जिंदगी में रोमांटिसिज्म के आगोश में आकर मैने कई दृश्यों को अनदेखा किया है, कई अधूरी सच्चाईयों को अपना लिया| जैसे टमाटर सुर्ख लाल ही अच्छा लगने लगा पर उसके लाल होने के पीछे मौजूद हानिकारक फर्टिलाइज़र को भूल गया| सब्जियां ठेला छोड़ किसी मार्ट से खरीदने लगा और अपनी ही मौत को अपनी पसंद समझ कर चुन लिया| अब आप समझ तो गये ही होंगे कि ऐसी दहनिए चेतावनी रोमांटिसिज्म के लिए देना क्यों ज़रूरी था| मैं यह नही चाहता कि आप अपनी परिकल्पना में मेरे इस ख़त द्वारा खाली छोड़े हुए पहलुओं को नाकारें| जब कभी बात निकले तो उन पहलुओं के बारे में जानने की भी कोशिश करें|

आगे बढ़ते हुए, मेरे शब्द आपको मेरे जीवन के कुछ महीनों की रोमॅंटिक छाया देने के लिए तैयार हैं| मुझे ओड़िशा में रहते हुए लगभग आठ महीने हो गए हैं| मैं यहां दो-तीन शहरों में ही गया हूँ| कुछ ख़ास घूमा नहीं पर यहाँ के शहर बाक़ी शहर जैसे नहीं हैं| हर जगह बस पहाड़ नज़र आएंगे| महत्वपूर्ण बात यह है कि मैंने अपना ज़्यादा समय काशीपुर गांव में गुज़ारा है| यह भुवनेश्वर से लगभग पंद्रह घंटे दूर ऊंचाई पर पहाड़ों के बीच बसा एक गाँव है| काशीपुर में मेरी संस्था अग्रगामी का कैंपस गांव से लगभग तीन किलोमीटर दूर है| पास ही, कुछ दो ढाई किलोमीटर के फ़ासले पर कुम्हारशिला गांव है, जहां से काफी सारी बच्चियां पढ़ने आती हैं|

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स्वप्ना, सुनीता और बिनोदिनि (अग्रगामी स्कूल, मुक्ता ज्ञान कुटीर)

अग्रगामी स्कूल में आस-पास के छः गाँव से प्राथमिक श्रेणी की लड़किया पड़ने आती हैं| मैंने भी कुछ दिन उन्हें चित्रकारी और अँग्रेज़ी सिखाई है| यहाँ आस-पास पहाड़, पत्थर, चावल, धान के खेत, कुछ बूढ़े पेड़ और यूकेलिप्टस ही दिखाई पड़ते हैं| कैंपस से थोड़ी दूर पदयात्रा करने पर ढेर सारे उमंग भरे चहरे नज़र आने लगते हैं, जहाँ अग्रगामी का प्राथमिक स्कूल है|

कैंपस के बाहर सकरी, लगभग 7 फीट लंबी सड़क है और हमारी बाउंड्री बैम्बू के बड़े बड़े शूट से सुसज्जित है| बाहर निकलते ही मेरा सबसे प्रिय पहाड़ है, इसको नाम अभी तक नहीं दिया पर कुछ देनें का बड़ा मन है| ये पहाड़ मुझे इसलिए पसंद है क्योकि ज्यादातर पहाड़ प्रकृति ने बनाए होते है पर इन पहाड़ो पर जैसे यहा कि जन जाती ने रंग दिया हो (अलग अलग रंग में लगभग चोकोर आकार में)| इन पहाड़ो पर चावल, रागी, आम, लीची, यूकेलिप्टस लगाए जाते है और हर मौसम पहाड़ अपना रंग-आकार बदलता है|इस तरह के पहाड़ पर खेतो को यहा “डोंगर” नाम से भी सम्बोदित करते हैं|

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सात फीट लंबी सड़क

मित्र तुम्हे पता है यूकेलिप्टस पहले “Ornamental Tree” जैसे परिचित हुआ था भारत में, यूँ तो उसमे कयी खमिया है और कई मायनों में वातावरण के लिए ठीक नहीं| पर इससे वह बदसूरत तो नहीं हो जाता, मुझे तो सच बड़ा खूबसूरत लगता है जब थोड़ा बड़ा हो जाता है| पेड़ो के बीच से रोशनी टपकती है और छाव की एक अनोखी जीयोमीट्रिक आकृति बनती है | हमेशा से इनके बीच चलने का मन था वो भी यहां आकर पूरा हो गया, मेरे साथ मेरे मित्र कुत्तो को भी इनकी सीधी पकड़ंडियो पर चलना पसंद है|

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इस पहाड़ को मैं क्या नाम दूं!

कैंपस में हर सीज़न के फलो और तरह तरह की सब्जियों के पेड़ है, चूकि हम मार्च में यहां आए थे हमारी शुरुआत कुछ कच्ची कैरी और गुलाब फल से हुई थी (बच्चो के ये फल बड़ा पसंद है, स्वाद गुलाब का और दिखता हलका हरा और छोटी गेंद  जितना बड़ा)| फिर आए पापाया और आम| फिर लीची और फिर बारिश में काला जामुन (black berry), उसके थोड़े पहले चीकू और केला| अगस्त में जामुन (guava)| इनके साथ साथ जैकफ्रूट की सब्जी और उसके शर्बत जैसे मीठे फल का स्वाद भी मिला| जैकफ्रूट के अंदर कैम्पस में बोहोत सारे पेड़ है, सब्जी ना होने पर इसे ही पका लेते है| मुझे जैकफ्रूट की सब्जी खासिया पसंद नहीं पर उसके कबाब का जवाब नहीं| किचन गार्डन में ड्रम स्टिक, बेगन, पापाया, टमाटर, मिर्च, बीन और आदि “zero-tillage” फार्मिंग तकनीक से उगाते है| No-tillage में आप माटी और वास्तविक वन जीवन से छेड़छाड़ नहीं करते| बीज फेक दिए जाते है जमीन पर और समय समय पर अधिक घास (weed) काट दी जाती है| बाकी क्या करते है ये हम दोनों को “विकी” पर देखना पड़ेगा|

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क्या युकलिप्टस के जियामेट्री सराहनिए नही?

पानी यहा सीधे जमीन के नीचे से नल से बाहर आता है, हम सब वही पीते है| इतना मीठा होता है कि बोतल का पानी भी फीका लगे| जब शरीर के अंदर उतरता है ऐसा प्रतीत होता है जैसे सीधे दिल तक पोहोचता हो| पाँच कुत्ते है, उनमे भालू मेरा सबसे अच्छा मित्र है|हमेशा मेरे सिरहाने बैठना, मेरे साथ खेतो के बीच, पेड़ो के बीच और सड़क पर हमेशा मेरे साथ रहता है| और शेरू अनोखे करतब दिखाता है, कुछ पत्थर-लकड़िया जो उसे पसंद नही, उन्हे वो पेड़ो के बीच छुपा देता है|

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भालू और मैं

यहाँ मैने हज़ारो जुगनू का दिलकश नज़ारा देखा, वो जिंदगी के कुछ अविस्मरणिया दिन थे| वो मय-जून के बीच के कुछ दिन| ये जुगनू समन्वित तरीके से टिमटिमाते है, जैसे लंबी सड़क पर एक एक गुच्छे अपनी रोशनी बिखरेंगे फिर वही रोशनी वापस आएगी| इन्हे Synchronous Fireflies भी कहते है| ऐसे जैसे आपस में बात कर सकते हो| किसी रात किसी दीवाली भी कभी इतनी खूबसूरत ना लगी हो| रात को चुपके से कमरे के अंदर आकर छत पर तारो की तरह टिमटिमाएँगे| मैं और भालू सात बजे से छत पर बैठे घंटो इन्हे ताकते रहते है| कभी कभी तो इसे देख आँसू बहने लगते थे, शायद क्योकि पलके झपकाने का भी जी नही चाहता था|दुनिया में दो हज़ार तरह के जुगनू है पर ये पृथ्वी के कुछ ही हिस्सो पर है|

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ज़िंदगी में कुछ ही चमत्कार देखे हैं, उनमे से एक है ये

रोशनी प्रदूषण के कारण तारे ने शहेरो में टिमटिमाना छोड़ दिया है और ऐसे परिवेश की गोद में ही आकर बस्ते है| यहा रातो को रोशनी चले जाने पर उन्ही से घंटो बातें की है सिर्फ़ पेड़ो के बीच से बात करती हुई हवा कुछ राग संगीत और शांति|

मैंने ज्यादातर दक्षिणी भाग ही देखा है ओड़िशा में, जैसा मुझे लगता है यह जनजाति अंग्रेज़ों की पकड़ से मुक्त रहे है| पर आज कल माइनिंग कंपनीया इन्हे अपने तलवे चटवा रही है| यहा की माटी जनजाति की है और ये सौंदर्या उनके स्वरूप की वजह से है| उन्ही से अपनी बंदेवी को सहेज रखा है| यहा दक्षिण ओरिसा का सबसे खूबसूरत टुकड़ा है कोरापुट,वहाँ और वहाँ की कहानिया फिर कभी|

ये था खूबसूरत रोमांटिक नजरिया काशीपुर और उससे जुड़ी वस्तुओ की पोटली| इसके परे बोहोत सारी दुख, अकेलेपन और हार मान लेने वाली परते भी है| चलता हूँ …

Half Half None

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The following blog has been co-written by co-fellows Daraab Saleem Abbasi and...

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