एक इंडिया फ़ेलो अपनी नोटबुक में क्या लिखता है

by | Oct 7, 2023

कुछ हफ्तों पहले मेरी दोस्त और को-फेलो आकांक्षा मेरी ऑफिस की नोटबुक पढ़ रही थी। हम कुछ लोग बस यूँ ही बैठे गप्प लड़ा रह थे की बोरियत में उसने इस नोटबुक को खोला। पन्ने पलटते-पलटते आकांक्षा को जो कुछ भी मज़ेदार, अजीब-ओ-ग़रीब या दिलचस्प लगता था वो उसे ज़ोर से पढ़ देती। इस आधे घंटे की प्रक्रिया में किसी को मेरे काम के बारे में ज़्यादा कुछ समझ नहीं आया, और न ही मैं हमेशा परख पाया की ये जो शब्द और पंक्तियाँ ये निकाल-निकाल के पढ़ रही है आखिर हैं किस बारे में या मैंने इन्हें कब लिखा होगा।

इस सब के बीच एक चीज़ ने मेरा ध्यान खींच लिया, कि कैसे इस नोटबुक में लिखी हुई बातें अपने आप में विभिन्न तरीकों से लिखी गयी हैं। साथ ही उनको लिखे जाने का उद्देश्य भी एक दूसरे से कितना अलग है। मैं एक साधारण ऑफिस की नोटबुक के विचित्र किरदार के बारे में सोच मन ही मन मुस्कुरा रहा था कि आकांक्षा बोली, “दाराब, तू अपनी नोटबुक में क्या-क्या लिखता है तुझे उसके बारे में एक ब्लॉग लिखना चाहिए“।

हम सब का हमारी किताबों, कॉपियों और डायरियों के साथ एक अनोखा रिश्ता होता हैं। सभी यह रिश्ता अलग तरीके से निभाते हैं और ये हमारे लिए अलग मायने रखता है। मेरा मेरी डायरियों के साथ एक बहुत गहरा रिश्ता है। उन्होंने मेरा सुख-दुःख में साथ दिया है और नए ख़्यालों को परखने में मदद की है। आज भी मैं अपने किसी चिंतन भरे समय को याद करूँ तो मुश्किल है कि मैंने अपनी डायरी न निकाली हो। एक समय में कोई भी कठिन निर्णय लेते वक्त, नए विचारों को खोजने के लिए और किसी भी ख़्याल को समझने के लिए मैं काग़ज़ और कलम पर निर्भर था।

लिखने की इस आदत के बारे में थोड़ा और सोचता हूँ तो इस सवाल से सामना होता है कि आखिर हम क्यों लिखते हैं? और ये जो हम काग़ज़ को घिस-घिस के निशान मारते हैं वो निशान हैं क्या? 

स्कूल में हमेशा से सीखा था की लिखाई दो किस्म की होती है, औपचारिक और अनौपचारिक। लेकिन अपनी आसानी के लिए मैं थोड़ी अलग परिभाषा का इस्तेमाल करूंगा। औपचारिक लिखाई मैं उस लिखाई को बुला रहा हूँ जो किसी तौर-तरीके और उसे पढ़ने वाले को नज़र में रख के लिखी गयी हो।उदाहरण के तौर पे कोई असाइनमेंट, रिपोर्ट और ब्लॉग। अनौपचारिक लिखाई मेरे लिए वो है जो हम अपने आप के लिए या अपने जान-पहचान के किसी व्यक्ति के लिए लिख रहे हो। इसके अंदर शायद आशिक शायरों की छोटी डायरी से लेकर किसी बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी की नोट्स की किताब तक आ जाती है।

नोटबुक

जब भी मैंने खुद को किसी भी तरह की औपचारिक लिखाई करते पाया है तो उसके पीछे का ‘क्यों’ काफी साफ़ रहा है। शायद मुझे कुछ काम दिया गया, या फिर कुछ नंबर दांव पे लगे हुए थे। या फिर मैं ऐसे ही किसी ब्लॉग के ज़रिये अपनी कोई बात सामने रख रहा था। ऐसे में हर बात को सोच समझ के शब्दों में समेटा जाता है। उन शब्दों के वाक्यों को ढांचों में डाला जाता है और एक कायदे से पेश किया जाता है। उसे सर और पैर दिए जाते हैं और जहाँ हो सके वहां सजाया जाता है। हर लेखक शायद अपनी लिखाई को एक दुल्हन की तरह नहीं सजाता पर हम में से ज़्यादातर लोग इतना तो ख्याल करते है कि उसका मुँह-हाथ धुला हो और उसके कपड़े फटे हुए न हो।

ये तो एक दुनिया है। उस दूसरी दुनिया का क्या? वो जहाँ पढ़ने वाला कोई नहीं है।

बचपन में मेरा लिखने के साथ का रिश्ता स्कूल की चार दीवारों तक ही सीमित था। इधर-उधर से सुन के और दूसरों का कहा मान के मैंने कई दफ़ा खुद की डायरी शुरू की पर ये सिलसिला कभी ज़्यादा देर चला नहीं। एक ऐसी चीज़ जो बिना मन के दूसरों के कहने पर शुरू की जाए शायद ज़्यादा देर नहीं चल सकती। लेकिन मुझे मेरी स्कूल की किताबें आज भी काफी रंगीन याद हैं।

स्कूल की कॉपियों को शायद हम खुद के लिए लिखी चीज़ न समझ पा रहे हों। आख़िरकार उनको भी तो हम दूसरों के कहे सवाल-जवाब और ज़बरदस्ती सौंपी हुई जानकारी से भरते हैं। पर मैं आप सब को याद दिलाना चाहूंगा की कोई भी कॉपी पहले पन्ने से भी खुलती है और आखरी पन्ने से भी। एक स्कूल के बच्चे की कॉपी में इन दोनों सिरों में दो अलग ही शहर बस्ते हैं। दोनों की भाषा, रूप रंग और रीति-रिवाज़ का एक दूसरे से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

हमारी दफ्तर की कॉपियों में भी ऐसे कई शहर बस्ते हैं, और उनके बीच अंतर करना अब शायद स्कूल से ज़्यादा मुश्किल है 

स्कूल, सिलेबस और होमवर्क की बाधाओं से मुक्त होने के बाद मैं ये देखता हूँ कि मेरी ऑफिस की कॉपी हर तरह की कॉपियों का मिश्रण बन चुकी है। एक बहुत खूबसूरत, स्वादिष्ट और प्यार से भरी हुई खिचड़ी। तो यहाँ अपनी उस नोटबुक से ऐसी कुछ चीज़ें लिख रहा हूँ जो मेरी नज़र में सिर्फ काम की बातें थी पर उनके अनेकों किरदार देखने के बाद मेरा मन उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सका।

“Systems thinking is about why things change or why they stay the same”

“Social work और community intervention को समझने में field पर जाना ही रह गया। कभी कभी वक़्त बिताना ही सब कुछ होता है।“

“Oil, onions – saute till brown; adrak lassan 1½ spoon…”

“How to manage chaos?”

खमीर से कुछ भी लेके आओ देखेंगे कि उससे रंग बनता है या नहीं”

“Someone who creates for a purpose greater than self expression. For communication, for someone else’s expression, to make something clearer, to make something simpler, to make something more accessible.”

“Meeting is for them to visualize how this might look like on ground”

मैं किन-किन चीज़ों के बारे में लिखता हूँ 

रेफ़रेंसिज़ और रिसर्च के लिए मुद्दे

यह मेरी नोटबुक का एक बहुत बड़ा हिस्सा बनाते हैं। जवाबों के साथ-साथ नोटबुक में सवालों का होना भी ज़रूरी है। कभी कुछ जानने में आता है जिससे एक जिज्ञासा खड़ी उठती है। और कभी किसी विषय के विशिष्ट भाग को गहरायी में या अपने सन्दर्भ में समझने की ज़रूरत महसूस होती है।

आश्चर्य और जिज्ञासा 

अलग अलग रंग, अंडरलाइन और छोटे-छोटे चित्र मेरे आश्चर्य को दर्शाने की कोशिश करते हैं। बड़े-बड़े अक्षरों और बार-बार लिखने से मैं किसी जानकारी से जुड़े भाव पर ज़ोर देने की कोशिश करता हूँ। यह दोनों चीज़ें मुझे अक्सर उन विषयों पर और पढ़ने के लिए मजबूर करती हैं। उनको हाईलाइट करना उनकी विभिन्नता दर्शाता है।

काम के विचार और उसकी अनगिनत संभावनाएं

ऐसे कई ख़्याल जो मेरे काम से शायद आज न जुड़े हों पर भविष्य में वो कैसा दिख सकता है, उसमें क्या जोड़ा जा सकता है और क्या नया काम शुरू किया जा सकता है इस बारे में हों। एक तरह के संक्षिप्त सपने जिनको रिकॉर्ड करने से आपके पास काम के प्रति एक जोश बना रहता है और साथ ही मेरा दृष्टिकोण स्पष्ट होता जाता है।

लोगों के साथ करी हुई बातें और उनसे मिली हुई सीख 

सीख, सलाह, अनुभव, प्रतिक्रिया और दृष्टिकोण। किसी के साथ की गई बात में से कभी-कभी कोई एक हिस्सा हमारे साथ रह जाता है। शायद हमने वो नज़रिया पहली बार अपनाया हो, उस बात को हम हमारे अनुभव से जोड़ पाए हों, या फिर कहने वाले की सोच और भाव से हम सही तरीके से जुड़ पाए हों। इन बातों को अक्सर शब्दों में उतारना बड़ा मुश्किल होता है। पिछले साल भर में मुझे बहुत लोगों से सीखने के बहुत मौके मिले और उन सबको मैंने अपनी नोटबुक में शामिल कर किया है।

लक्ष्य 

लम्बे चलने वाले सिलसिले और उतार-चढ़ाव से भरे कामों में लक्ष्य सामने होना व खुद को वह याद दिलाते रहना मुझे अपने रोज़मर्रा के कामों को दिशा देने में मदद करता है।

यह मेरे काम के बारे में क्या कहता है?

मेरे काम के बहुत सारे पहलू हैं जिनके चलते जो जानकारी मेरी नोटबुक में पहुंचती है वो अलग-अलग प्रकार की होती है। मेरा काम बहुत सारी सांस्कृतिक, परंपरागत और व्यक्तिगत मुद्दों को साथ में लेकर चलता है। जानकारी के अलग-अलग प्रकार और रूप होने के साथ हम देखते हैं कि वह अलग विषय से होती है। शिक्षा, स्वास्थ्य , रोज़गार आदि। हमारी, हमारे काम की और हमारी संस्थाओं की कार्यक्षमता और निपुणता के फायदे के लिए हम हमारे काम को विशिष्ट बनाने की कोशिश करते हैं। वो जिस दायरे में रहता है उसे छोटा करते जाते हैं।

इस विशेषज्ञता को अच्छा काम करने के लिए ज़रूरी माना जाता है और वह शायद सच भी है। लेकिन उसमें समुदाय नहीं रहता। उनकी ज़िन्दगी हमारे ही काम तक सीमित नहीं होती। ये बात मैं अक्सर भूल जाता हूँ। हम किसी भी समुदाय के लोगों के साथ काम कर रहे, उनकी ज़िन्दगी का हर पहलू उपयुक्त है। मेरी डायरी का हर पन्ना किसी न किसी समुदाय का ज़िक्र करता है। इनमें विद्यार्थी, बच्चे, शिक्षक, कारीगर, और ट्रेनर भी हैं। इसको भूल जाएं तो काफी सारी बातचीत, रिश्ते और बनते हुए सम्बन्ध काम की लिस्ट और पेंडिंग टास्क बन के रह जाते हैं। और हम किसी से व्यक्तिगत तौर पर जुड़ने का मौका गवां देते हैं।

हमारे काम में और मेरी नोटबुक में भी ख़्याली पुलाव व ज़मीन से जुड़े काम के बीच एक बहुत साफ़ लकीर खिची हुई है। हर दो पन्ने पर ख़्याली पुलाव पकने के बाद उसको संक्षेप में लिखा जाता है और छोटे-छोटे कामों में तोड़ा जाता है। ज़िम्मेदारियाँ बाटी जाती हैं और फिर या तो उस काम को अंजाम दिया जाता है या सही समय के लिए प्लान में डाल देते हैं।

मेरी ऑफिस की नोटबुक को मैंने हमेशा एक साथी की तरह देखा है जो मेरे अच्छे-बुरे दिनों में मेरा सहारा देती है। बाहर फैलते ख़्यालों को पकड़ती है, मेरे सोच-विचार का बोझ उठाती है और मुझे अपनी बातों को रूप देने में व उनपे अमल करने में मदद करती है।

अचानक एक साथ जब मैंने अपनी नोटबुक को पढ़ा तो ऐसा लगा जैसे कोई ठुसी हुई अलमारी का दरवाज़ा झटके से खोल दिया हो। एक मनोरंजन के लिए शुरू की हुई प्रक्रिया उन सब चीजों को याद करने का बहाना बन गयी जो मैंने कभी सोची थी, वो सब चीजें जो मुझे लिखते हुए महसूस हो रही थी, और जो मैं करना चाहता था।

ये प्रक्रिया काफी भारी थी और मुझे थोड़ा सा हिला के गुज़री। मैंने अपनी थकान देखी, अपने खेद देखे, खुशियों से भरे दिन देखे और उनमें आशा भरी छाँव देखी। पर मैं मुस्कुरा रहा हूँ और अपनी ये नोटबुक बंद करते समय इस बात की उत्साह से भरा हुआ हूँ की मैं आगे क्या करूंगा। वो सारी चीजें जो मैं अब भी करना चाहता है और फ़ेलोशिप ख़त्म होने से पहले करने की कोशिश करूंगा।

नोटबुक

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1 Comment

  1. Anonymous

    What a beautiful blog.Enjoyed reading every bit of it.

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