लोग बात बहुत करते हैं,
मौका मिलते ही
बातें चालू।
काम का बना दिया है हलवा,
और बातों का है असीम जलवा।
मुद्दा सामने ही था,
लेकिन पहले ज़रा किस्से-कहानी हो जाए।
जाओ किसी कॉन्फ़्रेंस में — ज्ञान बहुत देंगे,
जो नहीं आते ऐसी बैठकों में
वो बहुत कम मिलेंगे।
अरे, पर बातें भी तो ज़रूरी हैं,
हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा?
जिनकी बातें हैं, वो करेंगे —
एक नहीं, कई हज़ार हैं,
और ना वैसा मंच है,
ना उनके लिए कोई बाज़ार है।
ग़रीब गंजा ही रह जाता है,
अमीर बुढ़ापे में भी नए बाल लगवाता है।
मैं भी बातें बहुत करता हूँ —
काम, उससे भी कम।
बाल मेरे भी नहीं हैं,
और मिज़ाज सूरज से भी गरम।
0 Comments