Between Hindi & English: A Language Crisis

by | Jul 5, 2017

I’m slowly forgetting English. The words are avoiding me because I’ve ignored them for too long. Moreover, I kept putting them in Google Translate and converting them in Hindi. I’m not sure how angry they are, to stay away for a while or to never come back.

To give you a background, I have continuously been developing, translating, editing and proofreading Hindi content in my role at Chaitanya since about 4 months, all day, every day. So much, that now when I see Hindi boards and instructions on road, I want to make slight corrections or just mark it right if it’s written correct. On some nights, I’ve gotten up from sleep because of nightmares where my mentor was asking me to translate a few more paragraphs, and to do it ASAP. Not exaggerating at all.

Conversations in English are rare, reading time is non-existent and when I sit down to write, even thesaurus refuses to help. So, for the lack of enough English vocabulary for a post and for heaps of improvement in my mother tongue (dad would be proud), here is something in Hindi:

संस्था में पहले दिन
जब सभी को अपना परिचय देना था,
मुझे हिंदी में बात करने के लिए कहा गया
बहुत कोशिशों के बावजूद, अंग्रेज़ी टांग अड़ाती रही
आख़िर कई सालों की मेहनत के बाद सीखी थी
इतनी आसानी से पीछा कहाँ छोड़ती
न चाहते हुए भी मेरे आधे से ज़्यादा शब्द
अंगेज़ी भाषा में ही बाहर आये
ख़ुशकिस्मती से उस दिन ऐसे लोग काफ़ी कम थे
जिन्हें मेरी बात समझ न आई हो

अगले 3-4 महीने, बहुत समय गांवों में बीता
अक्सर इस्तेमाल होने वाले अंग्रेज़ी शब्द,
जैसे discussion, occupation, family और usually,
इनका यहाँ कोई काम नहीं था
कई बार इन्हें बोलते वक़्त मैंने महसूस किया
कि बीच में कहीं कुछ रह गया
कि मैंने अपनी बात किसी तरह कह तो दी
लेकिन शायद सामने वालों को समझा नहीं पाई
वहां से सिलसिला शुरू हुआ
‘चर्चा’, ‘व्यवसाय’, ‘परिवार’ और ‘आमतौर’ का

इधर फील्ड पर बोल-चाल सुधर रही थी
गाँव वाले मुझे सुनने लगे थे
कि उधर फ़ोन कॉल पर निर्देश आया
‘ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं’ पर
एक Presentation बनानी थी
तब से अब तक उसमें काफी बदलाव हो चुके हैं
ज़्यादातर तो मैंने खुद ही किये हैं
लेकिन आज भी उसे खोलकर देख लूं
तो उस समय की अपनी शक्ल और
दिमाग पर बोझ, दोनों याद आ जाते हैं

फिर जो हिंदी documentation का दौर शुरू हुआ
रिपोर्ट्स, ई-मेल और यहाँ तक कि व्हाट्सैप मैसेज भी
हिंदी में लिखकर भेज चुकी हूँ
अब तो Translate करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती
दिमाग में ख्याल भी देसी बनकर आता है
बीच-बीच में उर्दू लफ्ज़ ज़रूर दख़ल देते हैं
बचपन से घर में और TV पर जो सुनती आ रही हूँ
अच्छी बात यह है कि संस्था को उससे आपत्ति नहीं
जब तक सब कुछ सरलता से लिखा है,
और समय पर तैयार है, किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता

शिकायत है कि कुछ ख़ास सीखने को नहीं मिला
सोच कर कहूँ तो अभी भी यही कहूँगी
कि इतना समय सिर्फ अनुवाद (translation) में बर्बाद किया
लेकिन एक महीने बाद जब फ़ेलोशिप ख़त्म हो जाएगी
तो बाहर की दुनिया में जाकर
इसी बहाने मैं शायद खुद को
पहले के मुकाबले
दुगने लोगों से बात करने के काबिल समझ सकूंगी
जिन लोगों के लिए मैं कभी मैडम थी
अब शायद उनके लिए एक दीदी बन सकूंगी

Much gratitude to ‘Google Input Tools’. This post, and even the fellowship wouldn’t have been possible without you.

Half Half None

Half Half None

The following blog has been co-written by co-fellows Daraab Saleem Abbasi and...

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