“महिलाएं आत्म संदेह व विक्टिम ब्लेमिंग से ग्रसित हैं! आखिर क्यों?”

by | Oct 11, 2022

इस सीरीज के पहले आर्टिकल में गहराई से समझने व लिखने के लिए हैरेसमेंट मुद्दे के व्यतिगत चुनाव पर बात हुई है व दूसरे आर्टिकल में कच्छ से कम्यूनिटी की बातें, स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर पर डेटा क्या पिक्चर दिखाता है इस पर भी बात की गई है।

हैरेसमेंट पर सीधी सपाट बातें कहीं, अपना व स्त्रियों का अनुभव लिखा, डेटा दिखाया और अब हल की खोज में निकली। सबसे पहली बात जो कि ज़हन में आई, बहुत नीतियां बनी हैं, न्याय प्रणाली है, कानूनों में संशोधन भी है, ज़ुर्म के लिए सज़ा है, संस्थाएं हैं और मानव अधिकार भी है। सब तो है इस सिस्टम में कोई भी मुद्दा हल करने के लिए, तो यह हैरेसमेंट जैसा मुद्दा क्यों इतना जटिल है? शायद सटीक हल ना निकले पर एक दृष्टिकोण बनना अति आवश्यक है।

हैरेसमेंट के मामले में ज़्यादातर देखा जाता है कि महिलाएं आत्म संदेह व विक्टिम ब्लेमिंग से ग्रसित हैं। समाज ने इज्ज़त, आबरू का एक अदृश्य चोला जन्म से ही स्त्री को ओढ़ा दिया है, जिसे वो आत्मदाह करके ही उतार सकती है।

सहना, नज़रंदाज करना और चुप रहना यहीं एक आदर्श स्त्री के आभूषण हैं, जो कि इतने भारी और नुकीले हैं कि धीरे-धीरे गला रेंत देते हैं और उसे खबर भी नहीं पड़ती। एक स्त्री जो कि अपना पूरा जीवन अस्तित्व साबित करने में लगा देती है, सामाजिक बोझ तले दबी है और उस पर हुए शोषण कि आवाज़ तो जैसे एक बंद कमरे में ही गूंजने के लिए बनी है, जो बाहर निकलती है तो उंगलियां व सवाल खड़े होते हैं और अंकुश लग जाते हैं।

ऐसे में एक स्त्री को क्या करना होगा कि इस दलदल में धंसकर दम घुटने से अपने को बचा सके?

सर्वप्रथम स्त्री को स्वयं यह समझना होगा कि हैरेसमेंट गलत है, इसके लिए तुरंत आवाज़ उठाना ज़रूरी है। नज़रंदाज करना, सहना, अपने को दोषी मानना, डर जाना, समाधान नहीं है। हां! शायद लिखना सरल है पर इसके लिए हिम्मत जुटा पाना उतना ही कठिन। 

स्त्रियां बड़ी सहजता से अपने जीवन का नियंत्रण किसी ओर के हाथ में दे देती हैं, चाहे वो घर कि बात हो या समाज की। ऐसे में स्त्री को अपने जीवन के निर्णय खुद लेना सीखना होगा। अपने विकल्प खुद चुनने होंगे। जब स्त्रियां अपने विकल्प खुद चुनने लगेंगी तो उन पर अंकुश लगने व नियंत्रण रखने के प्रयास  समाज द्वारा पुरज़ोर तरीके से होंगे। ऐसे ही तो कोई अपनी सत्ता नहीं छोड़ता, इस प्रतिक्रिया का सामना भी स्त्री को मज़बूत तरीके से करना होगा।

यदि कोई स्त्री  हिम्मत करके अपनी बात रखती भी है, तो समाज से होने वाली प्रतिक्रियाओं के लिए सपोर्ट सिस्टम  होना आवश्यक है, जहां वो स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से सुरक्षित महसूस करे। ऐसी स्त्री जो कि समाज के बंधनों व दायरों से बाहर निकल चुकी है, इस सपोर्ट नेटवर्क द्वारा स्वीकारी जाए, उसे काउंसलिंग दी जाए व मार्गदर्शन किया जाए, ऐसा सिस्टम जो सरवाईवर्स द्वारा संचालित हो व उन्हे ही इस नेटवर्क को चलाने हेतु सशक्त करे।  

शोषण होता है यह हमें पता है पर शोषण होते हुए देखना? यह रोकना होगा। जब तक खुद पर बात ना आ जाए हम आवाज़ उठाने से कतराते हैं। यदि हमारे सामने, आस पास, ऑफिस, घर या सार्वजनिक स्थानों पर शोषण होता नज़र आए, तो दूर खड़े होकर उसे देखने या नजरंदाज़ करने के अप्रोच को बदलना होगा।

जो भी लोग ऐसे कृत्यों में संलग्न होते हैं, शायद उन्हे इसकी गंभीरता का अनुमान नहीं। मन पर होने वाले इसके आघात का असर पीड़ित के मन पर दीर्घ समय तक रहता है। हरस्मेंट को आम बात समझना, यहीं से उपजती है शोषण करने की मानसिकता। इसे शुरुआती स्तर पर ही लगाम देना और ऐसे बरताव का सामाजिक तौर पर विरोध व निंदा करना अति आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर – जैसे की नशा सामाजिक तौर पर निंदनीय कार्यों मे आता है, कईं राज्यों में यह बैन है, व इसकी रोकथाम के लिए कानून हैं। जिन राज्यों में अमुख कारणों से ऐसे कदम नहीं उठाए जा सकते हैं, नशा मुक्ति के अभियान चलाए जाते हैं, सिनेमा में भी इसके सेवन को हानिकारक दिखाया जाता है।लोगों में इससे होने वाली क्षति के बारे में संवेदनशीलता आए इसके लिए जागरूक किया जाता है। सक्रिय व अनिवारक तरीकों से रोकथाम के लिए अनेक कदम सरकार व समाज द्वारा उठाए जाते हैं। 

जब नशामुक्ति पर जागरूकता लाने के भरपूर प्रयास किए जा सकते हैं तो हरेसमेंट पर क्यूँ नहीं? अगर  सरकारें व समाज भी इस मुद्दे की गंभीरता को समझें तो ऐसे प्रयास किए जा सकते हैं। एक राज्य में ऐसा अवेर्नेस पायलट प्रोजेक्ट चलाकर देखा जा सकता है, जो दूसरे राज्यों में भी लागू हो सके। 

  • जैसे की सिनेमा हाल्स में विज्ञापनों के स्थान पर हरेसमेंट पर जागरूकता के लिए शॉर्ट फिल्म्स स्क्रीन हो। 
  • जब फिल्म का कंटेन्ट सेन्सर किया जाता है, तो इसे हरेसमेंट के लेंस से भी देखा जाए। ऐसा कोई भी सीन जो इसका महिमामंडन करता हो, सेन्सर किया जाए। (फिल्म ‘कबीर सिंह’ ऐसे महिमामंडन का एक अच्छा उदाहरण है।) 
  • गांवों कस्बों में नुक्कड़ नाटकों के द्वारा इस मुद्दे पर जागरूकता लाई जाए। 
  • बाल पंचायतों में इस मुद्दे पर डिबेट हो, व इसकी गंभीरता पर चर्चा का माहौल खड़ा हो। 
  • सरकार उन असुरक्षित स्थलों की पहचान का एक अभियान चला सकती है, जहां जरूरत बस हमें और सरकार को कदम उठाने की है। 

चित्र सौजन्य – आयुषी अजमेरा, पिनटेरेस्ट

जब बात परिपेक्ष्य निर्माण पर आती है, तो सवाल यह है की इसकी किसे जरूरत है? स्त्रियों को? या फिर समाज को? नेताओं को? राजनैतिज्ञों` को? शिक्षकों को? पोलीस विभाग को? तो यह होगा कैसे! 

इन सभी जगहों पर जेन्डर, यौनिकता जैसे विषयों पर सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हो, इसके लिए TOT (ट्रैनिंग ऑफ ट्रैनर्स) अति आवश्यक है। ऐसे ट्रैनर्स तैयार हों जो गांवों, कस्बों, शहरों मे जेन्डर के विषय पर सामाजिक चेतना लाएँ। विद्यालयों में शिक्षक, पोलीस विभाग कर्मचारी, व राजनैतिक क्षेत्र में युवाओं का वैचारिक परिवर्तन हो। ताकि जेन्डर को लेते हुए एक सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हो।वास्तव में जेन्डर जैसे मुद्दों पर आमतौर पर हमारी समझ विकसित ही नहीं की जाती है। हम जेन्डर को वैसे ही समझते हैं, जैसा हमें बताया जाता है, या देखते आ रहे हैं।

परिपेक्ष्य निर्माण द्वारा कुछ महीनों या सालों मे बदलाव दिखाई दे,आवश्यक नहीं। यह एक धीमी प्रक्रिया है। अगर वर्तमान में इसके लिए निरंतर कदम उठाए जाएँ तो आने वाली पीढ़ी पर इसका प्रभाव निश्चित तौर पर देखा जा सकेगा। बदलाव धीमा हो तो मतलब ये तो नहीं की उसकी और कदम ही न उठाए जाएँ| यह जिम्मेदारी केवल देश में चल रही कुछ महिला कल्याण संस्थाओं और फेमनिस्ट आंदोलनों तक ही सीमित न हो इसे हमें एक जागरूक नागरिक और समाज के तौर पर भी ध्यान में लाना होगा।  

यहाँ अधिकतर बोझ स्त्री पर होता है। अपनी आदतें, पहनावा, इच्छाए, करियर या पसंद बदलने को| जैसे कि अगर आप हरेसमेंट से बचना चाहती हैं, तो सेल्फ डिफेन्स सीखें, पेपर स्प्रे रखें, कपड़े ढंग से पहनें, या रात को अकेले बाहर न निकलें वगैरह-वगैरह! मॉरल पुलिसिंग द्वारा लड़के या लड़कियों को काबू में रखने के प्रयास भी किए जाते हैं। देश भर में जितनी भी शी-टीम खासतौर पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए कार्यरत हैं, वास्तव में क्या वो हरेसमेंट को रोक पा रही हैं, यह भी एक सवाल है! असल में इसकी जिम्मेदारी अगर पुरुषों व  समाज पर हो, जहां स्त्री के लिए ऐसा वातावरण विकसित किया जाए कि किसी प्रकार के शोषण के लिए उसे ही जिम्मेदार न ठहराकर हमारे  विचारों और सामाजिक, राजनैतिक  ढांचे पर काम किया जाए। तभी असली  बिहेवियर चेंज संभव है।

जब महिला के साथ हरेसमेंट होती है और बात जब कोर्ट में साक्ष्य साबित करने की आती है। बहुत मुश्किल होता है यह साबित करना कि किसी ने गलत तरीके से छुआ, देखा या कुछ कहा| जिस वक्त महिला हरेस हो रही होती है, साक्ष्य इकट्ठे करे या अपना स्वाभिमान बचाए? हरेसमेंट के साक्ष्य महिला के दिल और दिमाग में अंकित होते हैं। इसका सबूत देना इतना कठिन होता है, कि महिला न्यायिक व्यवस्था तक पहुँचने से पहले ही उसमे विश्वास खो देती है।ऐसी परिस्थियों में दोषी बहुत आसनी ने अपना बचाव कर लेता है।

विद्यालयों में जब मॉरल साइंस व बहेवियर पर चर्चा होती है। जहां हाल ही बच्चों  में गुड टच, बैड टच की समझ विकसित करने के सरकार के प्रयास प्रशंसनीय है। सभी किताबों के पीछे चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर भी दिए होते हैं। ऐसे ही किशोरावस्था में विद्यार्थीयों के लिए प्रभावी मॉरल साइंस क्लासेस पाठ्यक्रम में लाई जाएँ, जहां हरेसमेंट जैसे मुद्दों पर ‘मॉक ड्रिल’ हों। ऐसी परिस्थियों में विद्यार्थीयों को ‘फर्स्ट रेसपोंडर’ बनने का प्रशिक्षिण मिले। इन कक्षाओं में भावनाओं पर चर्चा हो। जिसके साथ हरेसमेंट हो रही है, उसे  कैसा महसूस होता होगा। किशोरों और किशोरियों को इसके बारे में अवगत करवाया जाए। विद्यालय व महाविद्यालाओं के NSS के कैम्प में हरेसमेंट पर लोगों में जागरूकता लाने के लिए विद्यार्थियों द्वारा  नुक्कड़ नाटक किए जाएँ। जहां इसकी गंभीरता पर चर्चा का माहौल खड़ा किया जाए।

जब बात महिला सुरक्षा की आती है, तो अधिकतर ऐड्वकसी महिला हिंसा, महिला रोजगार जैसे मुद्दों पर केंद्रित होती है। हरेसमेंट जैसे मुद्दों पर ऐड्वकसी अति आवश्यक है। जिसकी शुरुआत हम जमीनी स्तर की ‘वैकल्पिक विवाद समाधान’ (Alternative Dispute Resolution – ADR) न्याय प्रणालियों से कर सकते हैं। 

  • लोक अदालत 
  • ग्राम न्यायालय जैसी प्रणालियाँ हरेसमेंट जैसे मुद्दों पर भी अपना ध्यान खीचें, उचित दिशा में शिर्घ कार्यवाही करें और दोषी पाए जाने वाले हरेसर को संवेदनशील बनाने की कोशिश करें

एक महिला लेखक के तौर पर मैं भारत सरकार व न्याय प्रणाली से यह उम्मीद रखती हूँ, कि सरकारें महिलाओं पर होने वाले शोषण की सही समझ विकसित करते हुए, उपयुक्त कायदों के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाएँ। 

तो  केवल नियम, नीति- कानून कि बातें न करते हुए, लड़कियां व स्त्रियाँ  क्या चाहती  हैं, इस पर बात करना आज के समय की मांग है। जो विशेषज्ञ इस मुद्दे का पक्षपोषण करते हैं, वो क्या चाहते है, इस पर बात करना आज की मांग है। समाजों व सरकारों को यह खासतौर पर समझना होना कि हरेसमेंट कोई हल्का मुद्दा नहीं, जिसे दरकिनार कर दिया जाए, एक परत के नीचे ढक दिया जाए। यदि वास्तव में देखा जाए तो महिला सशक्त है, बस उसे ऐसा करने से बांधने व शोषण करने वाले नियम – ढांचों को तोड़ना आज की मांग है। स्त्री को पुरुष के जैसा गढ़ने की बजाय उसके स्त्रीत्व को जीवंत रखना आज की मांग है। 

*फीचर चित्र सौजन्य – www.knowlaw.in

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