मजबूरी, मजदूरी, पैसा और बीमारी…

by | Nov 24, 2021

गांवों से कई लोग काम की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं। वहां से क्या वे सिर्फ पैसा कमा कर लाते हैं? या पैसे के साथ और भी बहुत कुछ जाने अनजाने साथ आता है? आइये जानते हैं एक कहानी के जरिये।

जीरा एक 11 महीने की बच्ची है जो पन्ना, मध्य प्रदेश के बिल्हाटा गाँव में रहती है। बारिश के मौसम में इस गांव में कई बार आना-जाना बन्द हो जाता है। जंगल के कच्चे रास्तों पर जबबारिश का पानी भरता है तो यहाँ रस्ते भी नज़र नही आते। हर महीने के चौथे मंगलवार को इस गांव में टीकाकरण दिवस होता है जब नियमित रूप से सभी बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं की जाँच होती है। आज जब हम गांव पहुंचे तो दो-तीन महिलाऐं आपस में बात कर रही थी कि जीरा की तबियत ख़राब है। उसके परिवार से एक सदस्य ने आकर बताया कि जीरा को तेज़ बुखार है। उसको भी टीकाकरण में आना था लेकिन जीरा की माँ ने इन्कार कर दिया। बताया कि उसे बाबाजू की बिमारी हुई है और उसे अभी घर के बाहर नहीं ले जा सकते व दवाई नहीं दे सकते।

टीकाकरण दिवस

बाबाजू की बीमारी बुन्देलखण्ड में बहुत आम है| जब कोई इतना बीमार हो जाये कि खाना-पीना छोड़ दे तो उसे बाबाजू से ग्रस्त मान लिया जाता है। फिर झाड़-फूँक की एक लम्बी प्रक्रिया शुरू हो जाती है| इस दौरान मरीज को घर से बाहर नहीं जाने दिया जाता है और कोई दवाई भी नहीं देते हैं| कुछ स्थितियों में लोग ठीक भी हो जाते हैं| यह मान्यता लम्बे समय से चली आ रही है|

थोड़ी देर इंतजार करके हम जीरा को देखने उसके घर गये। वह तेज़ बुखार से कराह रही थी और कमज़ोर होकर 6 महीने के बच्चे की तरह लग रही थी। हमने परिवार से बात की कि जीरा को अस्पताल ले जाने की ज़रूरत है। जीरा के पिता, जो वन विभाग मे चैकिदारी का कम करते हैं, उनकी भी तबियत खराब थी|4-5 दिन से सरकारी वाहन न चलने की वजह से वो भी डॉक्टर के पास नहीं जा पा रहे थे और पैदल जाने में जंगली जानवरों का खतरा है। तो हम उन्हें व जीरा को अपनी गाड़ी से पन्ना आस्पताल लेकर आये।

डॉक्टर ने जीरा को भर्ती करके उसकी जांच करी, वजन लिया और कई टेस्ट करे| दो दिन बाद जब रिपोर्ट आयी तो पता चला कि उसे टी.बी. (ट्यूबरकोलोसिस) है| बच्ची को 14 दिनों के लिऐ विषेश देखभाल में रखा गया। सात दिन बाद उसका वजन बढ़ने लगा था| साथ ही छः माह तक जीरा काटी.बी. का पूरा इलाज चलना था।

ट्यूबरक्लोसिस एक संक्रामक बीमारी है जो आमतौर पर फेफड़ों पर हमला करती है और धीरे-धीरे शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती है। यह बीमारी दवाओं से ठीक हो जाती है लेकिन इसमें बहुत समय लग जाता है।अधिकतर मामलों में यह दवाई कम से कम 6 से 9 महीनों तक चलती है। इन गांव में पहले यह बीमारियां नहीं थी लेकिन अब जंगल की साफ हवा भी दूषित हो चुकी है। यहाँ के लोगों का ऐसा मानना है कि जब वे गांव छोड़ कर बाहर काम करने जाते है तो सक्रमित हो जाते हैं| वापस गांव लौटने पर धीरे-धीरे ये बीमारी आसपास फैलती है।

जीरा के बादटी.बी. के और भी केस सामने आने लगे थे| स्वास्थ्य विभाग से इस विषय पर बात हुई और हमने उनके साथ एकटी.बी. कैंप का आयोजन किया जिसमें सभी का टेस्ट हुआ| चौकाने वाली बात ये थी कि 15 बच्चों मेंटी.बी. जैसे लक्षण पाए गए और उनके परिवारों में भीटी.बी. की हिस्ट्री थी| इन 15 बच्चों में से 7 कोटी.बी. होने की पुष्टि हुई और सभी को 6 से 9 माह तक लगातार दवाई दी जा रही है।

इस पूरी प्रक्रिया में जीरा की माँ, रेखा में सब से बडा बदलाव दिखा। वो पहली बार जिला आस्पताल आई थी और यहाँ पहले ही दिन से उसने अकेले ही पति और बच्ची का ख्याल रखा| तीन दिन बाद जब उसके पति ठीक होकर गांव चले गये तो वह बच्ची के साथ ही रही| एक दिन अस्पताल में बात करते हुए उसने कहा कि यहाँ आकर मेरी बच्ची की जान बच गई, गांव में पता नही क्या होता। यँहा नर्स दीदी मुझे समझाती हैं कि बच्चे का ख्याल कैसे रखना चाहिए।

रेखा ने कहा, “यहाँ पर मैंने जो भी सीखा है, मुझे पहले किसी ने नहीं बताया – जैसे समय पर दवाई और खाना देना।” अस्पातल से छुटी होने के बाद डॉक्टर ने बच्ची को फॉलोअप के लिये लाते रहने की सलाह दी। रेखा नियमित रूप से सारेफॉलोअप कराने अकेले ही आती थी। पन्ना के जिन गांव में हम काम करते हैं, उन समुदायों में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है| आमतौर पर महिलाएं पुरुषों के साथ ही बाहर जाती हैं| रेखा का आत्मविश्वास देख कर ख़ुशी हुई।

Stay in the loop…

Latest stories and insights from India Fellow delivered in your inbox.

0 Comments

Submit a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: