पालमपुर तुम बड़े मत होना

by | Oct 3, 2018

ऊंची इमारतों से मकान मेरा घिर गया ,
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए !

यह शेर बिलकुल मुनासिब आता है उन बड़े शहरों पर जहाँ बहुत ऊंची-ऊंची इमारतें हैं| वह शहर अब देखूं तो एक कंक्रीट जंगल लगता है|

एक बार अपने बौस के घर, गुरुग्राम गया| उनका फ्लैट बिल्डिंग के काफी ऊंचे माले पर था| सुबह उठकर जब खिड़की से बाहर झांका तो देखा एक गरीब का घर था नीचे| कुछ टूटे-फूटे बर्तन उसके आँगन में रखे हुए थे| मिट्टी का फर्श था, कच्ची छत की एक झोपड़ी थी| वह मंज़र देखते ही दिल में ख़याल आया इस शहर की ऊंचाईयों और नीचाईयों का| बौस की बालकनी में धूप बेशुमार* थी मगर उस ग़रीब के घर पहुँच रहीं थीं सिर्फ़ कुछ बची-खुची किरनें जो 2 इमारतों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश में थीं|

पहाड़ भी ऊंचे होते हैं मगर वो किसी के हिस्से की धूप नहीं खाते| मैं फ़िलहाल हिमाचल प्रदेश के पालमपुर शहर में रहता हूँ| छोटा शहर, वो भी हिल स्टेशन, हुआ न सोने पर सुहागा| किसी भी जगह का वातावरण वहां रहने वाले लोगों के मिज़ाज* पर बहुत असर करता है| यहाँ ज़्यादातर लोग सख्त मिजाज़ नहीं होते, उन्हें अक्सर जल्दबाज़ी नहीं होती और न ही ज़रूरत से ज़्यादा काम होने पर उनका एंग्ज़ायेटी यानि घबराहट का स्तर बढ़ता है|

सड़क चलते अगर किसी गाड़ी को लिफ्ट मांगने के लिए हाथ देता हूँ तो वे रुक जाते हैं| बैठने पर सिर्फ दो ही सवाल पूछे जाते हैं – कहाँ जाना है? कहाँ रहते हो? मैं बता देता हूँ कि आविष्कार में रहता हूँ, जिसका नाम यहाँ सब जानते हैं| दूसरी तरफ अगर देखा जाये तो बड़े शहरों में हजारों गाड़ियाँ सड़क पर चल रही होने के बावजूद, कोई दुर्घटना होने पर भी अक्सर कोई नहीं रुकता है| ऐसे में लिफ्ट माँगना और देना तो बहुत बड़ी बात हो गयी|

एक बार की बात है| मैं अपने कमरे के बाहर बैठा था| एक भैया बाहर मैदान में कुछ काम कर रहे थे| सुबह का वक़्त था तो उन्होंने मुझसे पूछा कि नाश्ता कर लिया क्या| मैं जवाब में कहा, “अभी नहीं” जिस पर उन्होंने पूछा “क्यों”| मैंने बोला, “अभी मैंने बनाया नहीं, थोड़ी देर में बनाऊंगा”| ऐसा सुनते ही वो अपना काम छोड़ कर मेरी तरफ़ आए और कहने लगे, “चलो हमारे घर, वहीं खा लेना”| मेरे बार-बार मना करने पर भी वो नहीं माने| उनका यह स्वभाव देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा|

पालमपुर, हिमाचल प्रदेश का कंडबाड़ी गाँव जहाँ मैं रहता हूँ, बेहद ख़ूबसूरत है| यहाँ कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो बड़े शहरों में अपनी सिक्योर जॉब्स छोड़ कर यहाँ के वातावरण में रहने आए थे और यहीं के होकर रह गए| उनसे बात करके जितना मैं अभी तक समझ पाया हूँ वो यह कि पहले वे ख़ुद की अंतरआत्मा से जुड़ाव नहीं रख़ पाते थे; सुख शांति का जीवन व्यतीत नहीं कर पाते थे और इसीलिए उन्होंने यहाँ एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत की| हमारे बड़े शहरों को ऐसी छोटी जगहों से सीख लेनी चाहिए वरना किसी का कहा ठीक हो जाएगा कि जितना बड़ा शहर उतने बदख़लाक़* वहां के लोग|

*
बेशुमार – Endless
मिज़ाज – Temperament
बदख़लाक़ – Immoral

Half Half None

Half Half None

The following blog has been co-written by co-fellows Daraab Saleem Abbasi and...

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1 Comment

  1. Shamael Fatima Siddiqui

    Beautifully written, Palampur and its people are really worth remembering.

    Reply

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