ताबीर – एक नज़्म

by | Mar 9, 2019

डर लगता था अंधेरे में ग़ुम न जाऊं

इसलिए रौशनी में पनाह ले ली,

सोचा हर शा से आग़ाह हूं, महफ़ूज़ हूं,

काफ़ी है.

 

इस सिलिसिले की शुरुआत कब हुई, याद नहीं

पर कुछ लम्हों के अंदर ही सिमटी राहतें

ज़िन्दगी लगने लगीं.

ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब से तो ख़ूब मोहब्बत की

पर अंधेरे ने जब भी दावत दी तो आँखें चुरा ली,

गहराई बेहद थी, ख़ामोशी पुरशोर.

 

ग़ैर मामूली ख़्वाबों से

कभी अनजाने में मुलाक़ात हुई,

तो न-दीदा की तलाश में ख़ुद की क़ाबिलियत को

मानो एक नया अर्ज़ नसीब हो गया,

जो ना-क़ाबिल-ए-यक़ीन था!

इसे वक़्ती क़ुव्वत से मंसूब कर,

रात के साए में सहमा दिल

सुबह से रूबरू होते ही हँस पड़ता.

 

दिन भर नक़्श करता लेकिन, उन्ही ख़्वाबों की स्याही से,

आस लगाए, कि बस एक मुलाक़ात और

फिर काफ़ी है.

नूर से सौदा करता, चलूँगा कुछ दूर और

फ़िर काफ़ी है.

सोचती हूँ, यह उज़्र कहीं बेख़ुदी में तब्दील न हो जाए.

दिल हैरत करता है आज़ादी के ख़याल पे,

पर सियाह राहों में ही परवाज़ी है.

 

अब डर तो शायद नहीं,

पर आदत सी हो गयी है …

इसे कैसे समझाऊँ

यह रात की ही नवाज़िश है कि इसे हँसी अब तक मयस्सर है.


This poem attempts to portray the issue of mental health that makes people question their worth, thus, disallowing them from recognizing the extent of their capabilities. Illustration – Acrylic On Canvas. Inspired by Maria (Instagram – @maria_uve_)

Half Half None

Half Half None

The following blog has been co-written by co-fellows Daraab Saleem Abbasi and...

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2 Comments

  1. Anupama Pain

    I love this! Following your posts over the 7 months. Its been rewardign to read it. I look forward to your blog each time and cannot begin to tell you how visual they are! You have the knack – do write more. The variety of mix is also nice. All kinds of writing are covered well.

    Reply
    • Arunima Pande

      Thanks Anupama. I’m glad I’ve been able to reach out through my writing and knowing that is motivating. I intend to continue building on it.

      Reply

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