तड़पता बचपन

by | Jun 28, 2018

आजकल जिस जगह पर मैं रह रहा हूं वहां मेरे खाने में मुख्य रूप से शामिल व्यंजन का नाम है “खिचड़ी”. मुझे उम्मीद है कि आप सब इस व्यंजन से परिचित होंगे और जो नहीं है उन्हें आसान भाषा में बताऊं तो यह दाल, चावल, आलू, प्याज़ और मसाले इत्यादि को एक साथ मिश्रित करके मुख्यतः प्रेशर कुकर में पकाया जाने वाला भोजन है. मेरे मेन्यु में खिचड़ी की प्रमुखता की पहला वजह है इस क्षेत्र (नैनीताल का एक गाँव) की स्थिति, जहाँ ताज़ी हरी सब्ज़ियाँ मिलना बेहद कठिन है, और दूसरी वजह है कि इसे बनाना आसान होता है. मेरे लिए यही वो चीज़ है जो मुझे सही ढंग से बनाना आता है.

फिलहाल मैं इंडिया फ़ेलो में एक फ़ेलो हूँ और इसमें ब्लॉग राइटिंग का एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसके माध्यम से हम अपने अनुभवों एवं ज्ञान (learning) को एक दूसरे से साझा करते हैं. फिलहाल किचन की तरह ही मेरे दिमाग में भी विचारों और अनुभवों की खिचड़ी बन गयी है. पिछले दो ढ़ाई महीनों मे हमारे जीवन में नए अनुभवों की जैसे बाढ़ सी आ गई है. इस इलाके के लोगों की जीवनशैली, पेशा, संसाधन, संस्कृति, इत्यादि हमसे बेहद अलग हैं. इस हर एक चीज़ पर कई ब्लॉग लिखे जा सकते हैं और मैं पिछले कुछ दिनों से इसी उलझन में हूं कि किस मुद्दे को प्राथमिकता दी जाए.

इस ब्लॉग के माध्यम से जिस मुद्दे पर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं,
वह है देश और दुनिया का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों की अपने ही देश में दयनीय स्थिति.

फेलोशिप के दौरान मैं उत्तराखंड के एक सुदूर ग्रामीण इलाके में अवस्थित सीमित संसाधनों वाले एक स्कूल के साथ कार्य कर रहा हूं. यह पूरा इलाका जंगलों एवं पहाड़ों से घिरा हुआ है. क्योंकि यहां शहरों की तरह घूमने-फिरने और मनोरंजन के लिए मॉल, पार्क या सिनेमाघर (theater) नहीं हैं, अतः मैं छुट्टियों के दिनों में यहाँ पहाड़ों, खेतों और जंगलों में अक्सर भ्रमण करता हूँ. इस भ्रमण के दौरान इन सुनसान जगहों पर मुझे कई बार बच्चे एवं किशोर कई काम करते मिल जाते हैं, जैसे लकड़ियां काटना या चुनना, भेड़-बकरियां चराना आदि. पिछले एक महीने में ऐसे कई बच्चों एवं किशोरों के साथ मेरा सामना हुआ है जो छोटी उम्र में पढ़ाई की जगह कार्य व रोजगार में लगे हैं.

क्या आपको पता है कि 2011 की  जनगणना के मुताबिक भारत में लगभग साढ़े आठ करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं?

इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे विकसित देशों की जनसंख्या से कहीं बड़ी संख्या भारत में स्कूल न जाने वाले बच्चों की है. विश्व की एक विश्वसनीय संस्था, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में लगभग 4 करोड़ से अधिक बच्चे मजदूरी एवं खतरनाक कार्यों में संलग्न है और इनमें से लगभग 83 लाख बच्चे अकेले हमारे देश में हैं.

जिस देश में इतने बच्चे स्कूल जाने के बजाय मजदूरी एवं अन्य कामों में शामिल हो, उस देश की सरकार या नागरिक देश की तरक्की के चाहे कितने भी दावे एवं तर्क पेश कर लें, वास्तविकता खोखली और सतही ही रहेगी. इस तरह के विकास की स्थिति उस इमारत के समान है जिसकी नींव बेहद कमज़ोर है तथा रंगाई-पुताई करके उसे चमकदार बना दिया गया है.

जिस उम्र में इन बच्चों के हाथों में कलम एवं खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में इन लाखों मासूम हाथों में फावड़े, अन्य औजार या भीख मांगने का कटोरा थमा दिया जा रहा है. इसकी वजह चाहे जो भी हो पर मैं यह यकीन के साथ कह सकता हूं कि इन बच्चों की यह मजबूरी देश की कमज़ोरी साबित हो रही है. एक अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा बच्चा बड़ा होकर न सिर्फ बेरोजगार युवक बल्कि देश पर बोझ भी बनता है. ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2014 के अनुसार भारत में 28.7 करोड़ भारतीय पढ़ लिख नहीं सकते यानी दुनिया की 37% निरक्षर आबादी भारत में रहती है.

देश की सरकार भारत को सुपर -पावर और विश्व गुरु बनाने की कपोल कल्पनाएँ एवं दावा कर रही है पर अनपढ़ों, बेरोजगारों एवं बाल मजदूरों का इतनी बड़ी बोझ लेकर क्या यह संभव है? देश की हर समस्याओं के लिए सिर्फ सरकार और प्रशासन को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. अतः यह उपयुक्त सवाल मेरा आपसे एवं खुद से भी है.

हम और आप अपने दैनिक जीवन में कई बार छोटे बच्चों को ढ़ाबे पर या किसी के घर व दफ्तर में काम करते देखते होंगे. देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते आप ऐसी जगहों पर इन मासूम बच्चों से सेवा लेने से इनकार कर सकते हैं. कई बार अपने गली मोहल्ले या सड़कों पर बच्चों को भीख मांगते, तमाशा दिखाते या कुछ बेचते देखा होगा. ऐसे बच्चों से मानवता के नाते आप प्रेमपूर्वक दो बातें कर सकते हैं और यदि आप ईश्वर की कृपा से संसाधनों से परिपूर्ण व भाग्यशाली हैं तो ऐसे कुछ बच्चों को आप पढ़ाई-लिखाई में मदद भी कर सकते हैं.

यह ज़रूरी नहीं है कि आप ऐसे लोगों की मदद के लिए अनाथाश्रम, मंदिर, ट्रस्ट या किसी NGO में दान दें. यह आप अपने स्तर पर भी कर सकते हैं क्योंकि देश में 20 लाख से ज्यादा NGOs होने के बावजूद देश में अवस्थित लाखों ऐसे तड़पते बचपन हैं जो सरकार के साथ-साथ ऐसी संस्थाओं पर भी सवालिया निशान खड़ा करते हैं.

Say no to child labor!
Stop employing children. Educate them!

Stay in the loop…

Latest stories and insights from India Fellow delivered in your inbox.

1 Comment

  1. Swati Saxena

    Really liked how you started this post. The comparison between Khichdi in your food and that in your head made me laugh 😀
    I would like to know more about your role in the school and the school’s role in community, or children’s aspirations for themselves and their families, more in a realistic world than idealistic.

    Reply

Submit a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: