गांधी और हिंसा

by | Apr 23, 2020

गुजरात … मुझे यहां रहते पांच महीने हो चुके हैं| इस बीच तरह तरह के लोगों से मिलना हुआ है जो तरह तरह की दुनियाओं से आते हैं| उनके जीने और रहने के अपने तरीके हैं और वो उन तरीकों को बदलते समय के साथ बदलते हुए देख रहे हैं| मुझे अभी भी ये जगह बेहद अजनबी लगती है| मैं दिल्ली जैसे शहर में रह चुका हूं जो मुझे कुछ खास पसंद नहीं| उस शहर में इतने चेहरे हैं जिन्हें मैं जानता हूं और प्यार करता हूं जो खुद कई अलग दुनियाओं के बाशिंदें हैं और जो मेरी दुनिया से बेहद दूर हैं| मेरी दुनिया इलाहाबाद युनिवर्सिटी के सामने माही कैफ़े से लेकर युनिवर्सिटी रोड के पाकड़ के पेड़ तक है, मेरी दुनिया उस जगह पर है जहां आज़ाद आज भी बसे हुए हैं और जिन सड़कों पर निराला चलते थे| मेरी दुनिया इलाहाबाद में दोस्तों के घर से लेकर आंदोलनरत सड़कों तक है| और मैं उस दुनिया को बेहद याद करता हूं| कल रात की घटना से इस शहर से उचाट और अपने शहर की याद थोड़ी और बढ़ गई है।

2017, इलाहाबाद। बीएचयू में हो रही यौन हिंसा के ख़िलाफ़ एक मार्च में वहां एक लेस्बियन लड़की के साथ प्रशासन के दुर्व्यवहार की बात करते हुए। ये जगह बालसन चौराहा है। पीछे गांधी खड़े हैं। हालांकि 2019 में जब इलाहाबाद को प्रयागराज बनाया जा रहा था तब गांधी को चौराहे से हटा कर एक किनारे कर दिया गया।

गुजरात में आने के लगभग चार महीनों तक मैं एक छोटे से कमरे में रहा जो बेहद सुंदर जगह थी लेकिन उसमें छत की बजाय टिन शेड होने के कारण मुझे उसे गर्मी आने से पहले खाली करना पड़ा| अब मैं दो कमरों के एक मकान में एक और अन्य फ़ेलो के साथ रहता हूं| ये जगह ऑफ़िस से थोड़ी दूर है और जब मेरा साइकिल से जाने का मन नहीं होता तब मुझे छकड़ा लेने में थोड़ी मशक्कत होती है| इस जगह के नाम में गांधी है लेकिन जैसा मुझे कल रात एहसास हुआ कि गांधी इस जगह नहीं रहते| वैसे तो गांधी अब शायद इस देस में भी नहीं रहते| हर तरफ़ की राजनीतिक विचारधारा ने उन्हें दुत्कारा है और इस तरह उनके सही आंकलन से बचते रहें हैं| जहां अरुंधति राय जैसे लोग गांधी के पुराने लेखों का सहारा लेकर उन्हें अंबेडकर के विरुद्ध खड़ा करने की कोशिश करते हैं और इस बात को दबा जाते हैं कि गांधी लगातार अपने विचारों को तराशते रहे और जरूरत पड़ने पर बदलते भी रहे वहीं प्रज्ञा ठाकुर जैसे लोग गोडसे को ही मान देते हैं| ऐसे में गांधी एक फुटनोट बना दिए गए हैं|

कल रात 11 बजे के बाद फोन पर एक दोस्त से बात करते हुए मैं छत पर टहल रहा था| सामने के घर में नीचे आंगन से कोई शख्स कमर पर हाथ रखे बड़ी देर तक इस तरफ़ देख रहा था लेकिन मैंने उसपर ध्यान नहीं दिया| कुछ देर बाद जब उधर से आवाज़ें आने लगी तो समझ आया कि वो मुझे नीचे जाने को कह रहा है| ऐसा पहले मेरे साथ रह रहे फ़ेलो के साथ हो चुका है तो मैंने उन लोगों से पूछा कि आखिर बात क्या है? इस पर वो आदमी भड़क गया और उल-जलूल बकने लगा| मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और एक तरफ़ जाकर खड़ा हो गया| इतने में क्या देखता हूं कि वो बूढ़ा आदमी और शायद उसका बेटा हमारे दरवाज़े पर आ गए और मुझे नीचे आने के लिए कहने लगे| इतने में कुछ और लोग जमा हो गए| जब मेरे साथ के फ़ेलो ने दरवाज़ा खोला तो वो बूढ़ा कई तरह की गालियां बकते हुए कहने लगा कि छ्त पर नहीं चढ़ना है| और लोगों ने भी उसका साथ दिया| ये एक भीड़ थी और मैं गुस्से और डर से चुप था| बूढ़े के हाथ में एक डंडा था जो वो गालियां बकते हुए बार बार मुझपर चलाने के लिए उठा रहा था लेकिन चुंकि मेरे आगे दरवाज़ा और दूसरा फ़ेलो था, बूढ़े को मौका नहीं मिल रहा था| हालांकि उसने डंडे को सीधा कर बची जगह से अंदर की तरफ़ धकेला जो मेरे हाथ में हल्का सा लगा|

ये पहला मौका नहीं था जब भीड़ मेरे सामने हो, लेकिन ये पहला मौका था जब मेरे अंदर लड़ने की ताकत नहीं थी| उसी दिन मुझे दो लोगों की आत्महत्या की खबर मिली थी जिन्हें मैं नहीं जानता था| लेकिन वो दोनों इंसान थे और इंसान होने को मैं जानता था| एक लड़की और दूसरा एक समलैंगिक लड़का| ऐसा नहीं था कि मुझे पहली बार किसी की आत्महत्या की खबर मिली हो| ऐसी खबरें महीने में एक दो बार मेरे लिए आम हो चुकी हैं| अब इतना दुख हो चुका है कि नया दुख अलग से महसूस नहीं होता| अब मेरे मन में दो तस्वीरें थीं, एक तरफ़ दुनिया की तमाम तरह की झंझटों से आजिज आकर शांति से मर गए दो लोग और एक तरफ़ दुनिया में तमाम तरह की झंझटें पैदा करने वाली भीड़| शायद कोई और दिन होता तो मैं डंडे और भीड़ के सामने चुप ना रहता लेकिन मेरे अंदर एक अजीब तरह की शांति थी|

अभी सोचता हूं तो लगता है उस लपकते हुए बूढ़े के अंदर कितना विषाद भरा है! क्या इसका पूरा जीवन यूं ही कटा होगा? क्रोध में उन्मत्त, अर्थविहीन| ये अपने आस पास के लोगों से कैसे पेश आता होगा? इसके आस-पास के लोग इससे कैसे पेश आते होंगे? क्या इसने कभी प्रेम किया होगा? क्या ये कभी रोया होगा? क्या ये कभी चैन से सोया होगा? क्या इसने जीवन में कभी भी इतना हंसा होगा कि इसका पेट दुखने लगा हो और इसकी आंखें भर आई हों? आखिर कैसा रहा होगा इसका जीवन?

इस घटना से दो-तीन दिन पहले ही सामने से दो-तीन घर छोड़ एक घर में आदमी एक औरत को पीट रहा था, रमाशंकर ‘विद्रोही’ होते तो कहते “… मर्दों को रोती हुई स्त्री को मारना भी बुरा नहीं लगता / औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं / औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं / औरतें खूब ज़ोर से रोती हैं / मरद इतनी ज़ोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं …”| ना ही ‘विद्रोही’ थे और ना ही वो औरत मरी| कोई बाहर नहीं निकला| आखिर ‘अपने’ मरद से मार खाती औरत से किसी को क्या लेना देना? वो बूढ़ा और शायद उसकी बीवी जो भीड़ में थे उनका कहना था कि आंगनों में औरतें हैं जो छतों से दिखाई देती हैं| कितना अजीब है ना मार खाती हुई औरतें ना किसी को दिखाई देती हैं ना सुनाई देती हैं! औरतों का दिखना, देखना, देखे जाना, देख लिए जाना पितृसत्ता की सबसे बड़ी चिंता है|

भीड़ में से किसी ने ये भी कहा कि हम कम कपड़ों में छत पर घूमते हैं जो कि सरासर झूठ था| लेकिन भीड़ के लिए सच और झूठ का क्या मतलब है? वो बूढ़ा और उसका बेटा तो नंगी छातियों में थे, उन दोनों ने केवल पैंट पहन रखी थी, तो इस बात का क्या मतलब था? मैंने अपनी ज़िंदगी में कई तरह की भीड़ देखी है जो कभी मेरे तो कभी मेरे लोगों के खिलाफ़ खड़ी रही है|आप सोचें जिस भीड़ ने पहलू और अखलाक़ को मारा उस भीड़ का क्या मकसद था? जिस भीड़ ने मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में आग लगाई उसका क्या मकसद था? ट्रेनों में, आंदोलनों में, स्कूल में इस तरह की भीड़ जो लड़ने को हमेशा आमदा रहती है उसका आखिर क्या मकसद होता है? जो भीड़ डॉक्टरों, दलितों, ट्रांसजेंडर लोगों को पीटती है उसका क्या मकसद होता है? किसी भी भीड़ का क्या मकसद होता है? ये सारे सवाल आज के लगातार बदलते राजनैतिक माहौल में और जरूरी हो जाते हैं| पूरी दुनिया को धीरे धीरे एक भीड़ में बदला जा रहा है| इस भीड़ के लिए सोचना-समझना ज़रूरी नहीं है, केवल ईशारा मिलने पर अपना काम कर देना है| जो भीड़ आज आपके कहने पर ज़ोर-ज़ोर से ताली बजा रही है कल वो आपके कहने पर हत्या करने में भी पीछे नहीं रहेगी|

मैं जो लिख रहा हूं वो मेरे दुख और चिंता की अभिव्यक्ति है, ज़ाहिर है जो लोग भीड़ हो चुके हैं उनके लिए इन बातों का कोई मतलब नहीं है, उनतक शायद ये बातें पहुंचे भी नहीं| उस बूढ़े तक तो बिल्कुल भी नहीं| लेकिन आप अगर अभी भीड़ नहीं हुए हैं तो शायद आपको अपने आस-पास देखना होगा और उन लोगों को पहचानना होगा जो भीड़ बनते जा रहे हैं| और अगर हो सके तो उन्हें रोकना होगा|

गांधी शायद इसमें आपकी मदद कर पाएं| गांधी में जो प्रेम का भाव हर परिस्थिति में बना रहा, जिस करुणा से उन्होंने राजनीतिक धड़े में क्रांति का संचार किया उसे समझे जाना ज़रुरी है| मैं सोचता हूं, गांधी मेरी जगह होते तो क्या करते? उस लपकते हुए बूढ़े की तरफ़ कैसे हाथ बढ़ाते? इस भीड़ से क्या कहते? भीड़ बनते इस देश से क्या कहते? भीड़‍ बनाने वाले नेताओं से क्या कहते? शायद अपने चिर परिचित अंदाज़ में मुस्कुराते और गाते: “वैष्णव जन ते तेने कहिए जे / पीड़ पराई जाणे रे”|

Half Half None

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The following blog has been co-written by co-fellows Daraab Saleem Abbasi and...

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