कुछ नए जीवन सिद्धांत

by | Dec 19, 2019

single story के आधार पर हम किसी भी व्यक्ति या देश या समूह या जाती या लिंग के लिए रूढ़िबद्ध धारणा बना लेते

जीवन में आप कई लोगों को मिलते या देखते हो मगर कुछ लोग होते है जो आप पर एक अलग प्रभाव छोड़ जाते है। उनकी कोई न कोई बात आपके चीज़ो को देखने का नज़रिया बदल देती हैं। मेरे फ़ेलोशिप के पहले महीने में मैं ऐसे ही कुछ लोगो को मिला जिन्होंने मेरा ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदल दिया। आप सोच रहे होंगे की एक महीने में ऐसा क्या ही हो गया कि ये व्यक्ति ऐसे बदलाव की बात कर रहा है। इस पर मेरा जवाब होगा की अब तक मैं खुद के नज़रिये को अपने ही आत्मविश्वस्ता के कारण सीमित रख रहा था। जी हाँ, हम अपने आत्मविश्वस्ता से कई बार चीज़ो को अलग नज़रिये से नहीं देख पाते है या सच कहूँ तो देखना नहीं चाहते है। इस चीज़ के कारण हम लोग और हालत को समझने में ग़लती कर लेते है। हमारे फ़ेलोशिप की इंडक्शन ट्रेनिंग के पहले हफ्ते में हमे रूरल इमर्शन प्रोसेस के लिए कुछ गाओं को देखने और समझने का मौका मिला। इस प्रोसेस पहले दिन पर हमे प्रसिद्ध नाइजीरियाई लेखिका चिम्मंडा गोज़ी का टेड टॉक दिखाया गया।

चिम्मंडा ने टॉक में single story की बात की। single story का मतलब है एक ही कहानी सुनकर या पढ़कर उसे ही पूर्ण सत्य मान लेना। चिम्मंडा ने कहा कि single story से हम रूढ़िबद्ध धारणा बना बना लेते है। ये नहीं की वो धारणा के तहत कहानी ग़लत ही हो मगर शायद वो कहानी अधूरी हो सकती है। उन्होंने अपने ही बचपन का उदाहरण देते हुआ कहा की जब वे अमरीका में अपने कॉलेज की पढ़ाई करने पोहची तब उनके कॉलेज के साथियों को ये विश्वास नहीं हो रहा था की वो अफ़्रीका से आयी है। ये इसीलिए हुआ क्यूँ कि उन्होंने अफ़्रीका के बारे में एक ऐसी धारणा बना रखी है की अफ़्रीका बेहद ग़रीब है और जिसके कारण बच्चे पढ़ नहीं पाते। ये धारणा सही हो सकती है मगर हर व्यक्ति व देश के लिए पूर्ण तरीक़े से सत्य नहीं हो सकती। उनके साथियों ने न्यूज़ एवं फ़िल्मों में दिखाए जाने वाला अफ़्रीका को ही अफ़्रीका का सत्य मान लिया।

इस से ये मालूम होता है की कैसे single story के आधार पर हम किसी भी व्यक्ति या देश या समूह या जाती या लिंग के लिए रूढ़िबद्ध धारणा बना लेते। जो कि हमारे नज़रिये को एकतरफ़ा बना लेता है और हम किसी भी और नज़रिये से देख या स्वीकार नहीं कर पाते। चिम्मंडा गोज़ी के इस टेड टॉक ने मुझे बेहद प्रभावित किया और रूढ़िबद्ध धारणा न बनाने का जीवन सिद्धांत अपनाने की प्रेरणा दी।

रुरल इमर्ज़न के दौरान मेरी मुलाक़ात उदयपुर के पास स्तिथ मदार गाँव के एक दिलचस्प व्यक्ति लक्ष्मीलालजी से हुई। एक शाम जब सूरज ढलने की कुछ देर बाद मेरे नियुक्त गुट के साथ मदार से उदयपुर के लिए निकल रहा था तभी ही हमें अंधेरे में एक आकृति आती दिखी। इस व्यक्ति (लक्ष्मीलालजी) ने अपने गाँव में अजनबी चेहरे देख हमारे बारे में पूछ पड़ताल की और अगले ही क्षण मंदिर में चल रहे समूह भोजन में हमें न्यौता दे दिया। हमारे भूकें पेट को इस प्रस्ताव को जीवन दान सा समझा और हम समूह भोजन में हिस्सा लेने चले गए । गरमा गरम पुरियों के साथ कद्दू की सब्ज़ी का लुत्फ़ लेने के बाद लक्षमिलालजी के साथ कुछ देर और बातें हुई। उनसे बात करते मालूम हुआ की वे  बच्चों को परामर्श सेवा (counselling) प्रदान करते है। मुझे उनके तरीक़े जानने की उत्सुकता हुई और मैंने उनसे पूछा की वे किस तरह से मदद करते है?

उनहोंने दो दिन पहले हुई घटना के बारे में बताया। एक ग्यारहवीं कक्षा का लड़का अपनी साइयन्स पेपर को लेकर चिंतित था। उसे यह यक़ीन हो चला था की वो पेपर में फेल होगा क्यूँकि उसे प्रमुख पाठ्यक्रम नहीं आता था। वो पेपर नहीं लिखना चाहता था। लक्ष्मीलालजी ने उसे समझाया कि केवल अंको से उसका करियर नहीं तय होगा और जहां तक पास होने की बात है वो मुश्किल नहीं है, उन्होंने पूछा उसे कितने पाठ आते है और टोटल कितने है। उसे ८ में केवल २ पाठ ठीक से आते थे। लक्ष्मीलालजी ने कहा इसका मतलब उसे बस २ और पाठ तैयार करने है और वो पेपर में पास हो जाएगा। ये सुनकर लड़के की चिंता आशा में बदल गयी और उसे खुद पर भरोसा हुआ की वो केवल २ और पाठ पढ़कर भी वो पेपर में पास हो सकता है। एक मामूली से सुझाव ने चिंतित लड़के की समस्या दूर कर दी।

लक्ष्मीलालजी और मेरे को-फ़ेलोज़ के साथ मदार गांव के मंदिर में

मैं काफ़ी प्रभावित हुआ और मैंने ये सीखा की कितनी भी बड़ी समस्या हो पर अगर उसे ठीक से समझा जाए और परेशानी को बाँटकर समाधान खोजा जाए तो समस्या का हल मिलना मुश्किल नहीं है। आज भी मुझे जब कोई समस्या पर उनकी राय लेना महत्वपूर्ण लगता है लक्ष्मीलालजी से बातें हो जाया करती है।

इंडक्शन ट्रेनिंग के बाद से मैं मुंबई में स्तिथ सेंटर फ़ोर सोशल ऐक्शन के साथ जुड़ा हुआ हूँ। यह संगठन महाराष्ट्र के कठकारी आदिवासी के उन्नति के लिए काम करता है। संगठन के निर्देशक फ़ाधर मारीओ मेंडेज़ अगले व्यक्ति जिन्होंने मेरे ज़िंदगी देखने के नज़रिये को बदला है। फ़ाधर मारीओ एक बेहद बुद्धिमान व सरलता से भरे इंसान हैं। उनके समस्याओं को समझने के तरीक़े और हर काम को पूरी शिद्दत से करने की प्रतिबद्धता बहुत प्रेरणादायक है। मैं फ़ाधर मारीओ से जुड़े कुछ वाक्य यहाँ बताना चाहूँगा। 

पहली कहानी है सरलता की। कुछ दिनो पहले हम सभी एक मीटिंग में शामिल हुए थे जो कि फ़ाधर मारीओ के ऑफ़िस में हो रही थी। मीटिंग शुरू होते दौरान हमने ये महसूस किया कि लोगों के हिसाब से कुछ कुर्सियाँ कम पड़ रही थी। तभी ही मैंने देखा की फ़ाधर खुद ही मुख्य ऑफ़िस से कुर्सियाँ लेने चले गए है। बात यह नहीं की पीऑन के होते हुए भी फ़ाधर ने उसे कुर्सियाँ लाने को नहीं कहा, बात ये है की उन्होंने अपने ऑफ़िस में आए लोगों को आरामदायक करने की ज़िम्मेदारी खुद की समझी और उसपर अटल भी किया। यह छोटा सा वाक़या मुझे बहुत कुछ सीखा गया। अक्सर जिन लोगों के साथ हम काम करते है उनकी मनोस्तिथि समझने की कोशिश भी नहीं करते, जिसके कारण काम में तनाव पैदा होता है और कार्य-क्षमता कम होती है। फ़ाधर के ये छोटे से क़िस्से ने हमें उनकी मौजूदगी में आरामदायक ही नहीं निरसंकोच अपनी बात रखने का आस्वशन भी दिया। यह हमारी कार्य-क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। सोशल सेक्टर में भी कौशल की उतनी ही ज़रूरत है जितनी कॉमर्स सेक्टर में।

दूसरी कहानी है सुध-बुध की। सेंटर फ़ोर सोशल ऐक्शन एक फ़ंडेड संस्था है। विभिन्न प्रोजेक्ट्स के लिए ये संस्था अलग अलग जगह से फ़ंड जमा करती है। ये कहानी हमें खुद फ़ाधर मारीओ ने सुनाई थी। कुछ दिनों पहले फ़ाधर मारीओ अपने कुछ फ़ंडिंग पार्ट्नर्ज़ के साथ बात-चीत कर रहे थे। जिस दौरान एक व्यक्ति ये चिंता जताई कि वे फ़ंड्ज़ कठकारी आदिवासी के कल्याण के लिए देते है मगर काफ़ी पैसा सेंटर फ़ोर सोशल ऐक्शन की टीम की पगार में दे दिया जाता है। ऐसा कोई सवाल या चिंता ग़र कोई मुझे ज़ाहिर करता तो बशर्ते मैं उसका जवाब नहीं पाता। मगर फ़ाधर ने बड़े ही चतुराई से उनकी ये चिंता दूर की। फ़ाधर मारीओ ने कहा सेंटर फ़ोर सोशल ऐक्शन को प्रोजेक्ट्स सफल करने के लिए कौशलवान युवाओं की ज़रूरत है।  उन्होंने सबके समक्ष ये प्रस्ताव रखा की वे उन सभी के कौशल्यवान बच्चों को सेंटर फ़ोर सोशल ऐक्शन में नौकरी देने को तैयार है बशर्ते बस कम पगार पर। यह चतुराई भरा जवाब चिंतित फ़ंडर्स को यक़ीन दिलाने के लिए काफ़ी था की सोशल सेक्टर में भी कौशल की उतनी ही ज़रूरत है जितनी कॉमर्स सेक्टर में। ये छोटी सी कहानी भी मेरे मन को छू गई।जैसे कौशल की तुलना करना ग़लत है वैसे ही पगार की तुलना करना भी ग़लत है।

अपने आस पास लोगों को समझने और उनसे सीखने के मेरे हसींन सफ़र के पहले कुछ दिन कुछ यूँ गुज़रे है। मेरी यही आशा रहेगी की इस पूरे सफ़र में मैं ज्ञान बटोरते और सीखते चलूँ। 

Stay in the loop…

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3 Comments

  1. Saurav Bhaskar

    thanks Raaj bhai, aapke blog se mujhe mere ek problem ka solution mil gaya
    काफी बढ़िया लिखा है।

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    • Raajpratap Thakur

      Acha laga ye jankar. शुक्रिया सौरव

      Reply
  2. Raajpratap Thakur

    Acha laga ye jankar. शुक्रिया सौरव

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