काश कि मेरा ये सपना सच नहीं हुआ होता

by | Jan 5, 2021

ANM (Auxiliary Nurse Midwife) अर्थात सहायक नर्स दाई का पद स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी संगठन में सबसे कार्यकारी है। एक ANM का काम सुनने में जितना आसान लगता है उतना होता नहीं है। समुदाय के बीच हर रोज़ ये ज़मीनी कार्यकर्ता हर दिन नई चुनौतिओं का सामना करती है। ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए लोगों से संपर्क करती है। सरकारी परियोजना के अनुसार मरीज़ों की सुरक्षित व प्रभावी देखभाल करने में ANM की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसी के साथ मरीज़ों के रिकार्ड्स की जानकारी अन्य विभाग कर्मचारियों तक भेजना एवं राष्ट्रीय स्तर पर चलाये जा रहे स्वास्थ्य कार्यक्रमों में सहयोग करना भी ANM की ज़िम्मेदारियों में आता है। सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लिए गांव में पहला संपर्क इन्हीं से किया जाता है।

पन्ना के जिन गांव में मैं कोशिका के साथ काम कर रही हूँ, वहां ANM के तौर पर विद्यावती दीदी काम करती हैं. यह लेख उन्हीं के बारे में है. अपनी शुरुआत के बारे में वे बताती हैं,

‘‘मेरी नौकरी 1989 में लगी थी, और इस समय मेरा पाँचवाँ बच्चा हुआ था. मेरी शादी जल्दी हो गयी थी, जब मैं 8वी कक्षा में पढ़ रही थी, फिर बच्चे भी जल्दी हो गए। मुझे पढ़ना-लिखना बहुत पसंद था। लेकिन ससुराल में पूरा समय चौंका-चूल्हा में निकल जाता था। तो सारा दिन काम करने के बाद रात में हर रोज दिये की रौशनी में, मैं अपनी पढ़ाई करती थी। मेरे पिता जी गाँव में मास्टर थे|पढ़ाई में मेरी लगन देख कर उन्होने मेरा 10वी का फार्म भरवा दिया था। मैं ससुराल में रातों को छुपकर पढ़ाई करती थी, और परीक्षा के समय पिता जी के घर जाकर वहाँ से परीक्षा देती थी. 10वी कक्षा मैंने सेकण्ड डिवीज़न से पास कर ली।”

“उस समय मेरे पति दिल्ली में मजदूरी करते थे. ससुराल वाले बहुत गरीब थे. बड़ा परिवार था, दो-दो दिन तक ठीक से खाना नहीं मिलता था. पूरा दिन काम करना पड़ता था. पति बाहर थे तो उनके हिस्से का काम भी मुझे संभालना होता था. इस सब के बीच किसी तरह मैंने 11वी कक्षा भी पास कर ली और पति को बताया कि मैं नौकरी के लिए आवेदन डाल रही हूँ. जब मुझे ट्रेनिंग का लेटर मिला तो पूरे एक साल तक उन्होंने बच्चों को संभाला”

ANM को परिवार नियोजन, स्वास्थ्य, पोषण शिक्षा के साथ-साथ स्वच्छता एवं पर्यावरण संबंधित कार्यों में भी भाग लेना होता है। पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में जहां परिवहन सुविधा कमज़ोर होने की संभावना अधिक होती है, वँहा महिलाओं की डिलीवरी घर पर ही कराने के लिए ANM की आवश्यकता होती है। साथ ही वे आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता और ASHA का मार्गदर्शन करती हैं।

विद्यावती दीदी अपने सफ़र के बारे में आगे बढ़ते हुए कहती हैं, ”मेरी पहली पोस्टिंग पन्ना के गहदरा गांव में हुई थी. 30 साल से आज तक मैं यही हूँ. पहले दिन जब मैं इस गांव में आई थी, तो पूरा गांव मेरे पीछे चल रह था। बच्चे, बूढ़े, औरतें, आदमी – सब लोग. कोई महिला भी नौकरी कर सकती है, ये उन्हें पहली बार पता चला था. विभाग के अन्य अधिकारियों के साथ जब यँहा आती थी, तो गांव के लोग बातें करते थे कि ये आदमियों के साथ काम करती है, उनके साथ बैठती है और घूँघट भी नही करती। ये सब सुन कर और देख कर लगता था कि शायद नौकरी नहीं कर पाऊँगी।”

“जहाँ मैं अपनी हिम्मत हार जाती थी, वहां मेरे पति मेरा साथ देते थे। उन्होंने कहा हम गहदरा गाँव में ही रहेंगे, तो तुम्हें कोई कुछ नहीं बोल पायेगा। वे साईकल से मुझे गाँव-गाँव लेकर जाते थे, साथ में छोटे-छोटे भी होते। नौकरी में वेतन एक मिलता था लेकिन हम दोनों ने मिलकर 30 साल तक नौकरी की है। यह इतना पिछड़ा क्षेत्र था कि हम किसी भी गांव में जाते तो वहां के आदमी जंगल में भाग जाते थे और महिलाएं कोड्डी (मिट्टी की टंकी जिसमे अनाज रखा जाता था) में छिप जाती थी।”

“सभी गांव जंगल के अंदर बसे होने की वजह से यहाँ बिजली, सड़क, बस, गाड़ी कुछ नहीं था. दूर-दूर तक कटीली झाड़ियाँ और कभी-कभी जंगली जानवर भी दिख जाते। अगर गांव में परिवार नियोजन पर बात छेड़ दी, तो सब उठ कर चले जाते थे. फिर हमने अलग-अलग बात करना शुरू किया, मेरे पति गांव के आदमियों से और मैं महिलाओं से परिवार नियोजन पर बात करती थी। लोगों का देवी देवताओं पर इतना विश्वास था कि वे बुखार में भी झाड़-फूंक करते थे और दवाइयां फेंक देते थे.”

गांव में जब हेल्थ कैंप लगता है या टीकाकरण होता है तो Vaccine Delivery1 का कार्य करने के एक व्यक्ति नियुक्त होता है जिसकी ज़िम्मेदारी होती है टिकाकरण के दिन सही समय व स्थान पर वैक्सीन का डब्बा पहुँचाना, साथ ही उसके तापमान का भी विशेष ध्यान रखना। यह काम यहीं ख़त्म नही होता है। वैक्सीन का डब्बा समय के अंदर वैक्सीन स्टोर में जमा करना पड़ता है। यहाँ समय की पाबंदी के अंदर काम ख़त्म करना ज़रूरी है। ”मेरे पति भी Vaccine Delivery का काम करते थे। क्योंकि मेरे क्षत्रे में यह स्थान खाली था, और उन्हें इसकी जानकारी थी, तो वह ये काम करने लगे”, विद्यावती दीदी ने कहा.

‘‘हर बार की तरह उस दिन भी मेरे पति टीकाकरण के लिए वैक्सीन का डब्बा लेने गये थे लेकिन रस्ते में ही उनका एक्सीडेंट हो गया. पता चलने पर उन्हें नज़दीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर गये तो डॉक्टर ने कहा कि उन्हें जबलपुर ले जाना पड़ेगा, जहाँ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं. सर में अंदरूनी चोट आयी थी जिसके कारण वह बेहोश थे और बहुत खून बह रहा था. एम्बुलेंस और ऑक्सीजन न मिलने पर ऐसी गंभीर हालत में जब हम उन्हें प्राइवेट गाड़ी से लेकर चार घण्टे का सफर तय करके जबलपुर अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।”

“जिसने मेरा हर कदम पर साथ दिया, नौकरी करने में मेरी मदद करी, आज उसी नौकरी ने उन्हें मुझ से छीन लिया। लोगों की सेवा करते-करते, मैं हमेशा के लिए अकेली हो गयी हूँ। नौकरी नहीं करती तो शायद मेरे साथ ये नहीं हुआ होता। विभाग से किसी प्रकार की न कोई मदद मिली, न कोई मिलने आया जबकि मेरे पति का एक्सीडेंट ऑन ड्यूटी हुआ था। ज़मीनी कार्यकर्ता हैं, बड़े अधिकारी नहीं हैं, शायद इसलिए।”

आये दिन हम दुर्घटनाओं के बारे में समाचार और पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते रहते हैं, और खबर समझकर भूल जाते हैं। लेकिन ऐसी दुर्घटनाएं लोगों से उनका सब कुछ छीन लेती हैं। संस्थान प्राइवेट हों या फिर सरकारी, जिन लोगों का चयन किया जाता है, उन्हें कम से कम साधारण सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए। बेरोज़गारी के चलते लोगों को जो भी काम मिलता है, वे करते हैं लेकिन संस्थानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वो भी इंसान हैं और उनका जीवन भी उच्च अधिकारीयों के जीवन जितना ही महत्वपूर्ण है.

* विद्यावती जी की अनुमति लेकर ही उनके बारे में लिखा गया है.

Reference

  1. Strengthening Immunization Systems To Reach Every Child

Pictures by Swati Saxena

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